आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता Oṃ jaya Lakṣmī mātā

लक्ष्मी आरती — 'ॐ जय लक्ष्मी माता' से प्रारम्भ होने वाली — धन, समृद्धि और शुभता की देवी लक्ष्मी की आराधना का सर्वप्रमुख गीत है। यह शुक्रवार, दिवाली, और दैनिक सन्ध्या-पूजा में गाई जाती है। ज्योतिष में

8 श्लोक · 6 मिनट पाठ · वैष्णव
1
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥
ॐ, माँ लक्ष्मी की जय हो! हे माँ, लक्ष्मी माता की जय हो! शिव, विष्णु और ब्रह्मा — सृष्टि के तीनों प्रमुख देव — रात-दिन आपकी सेवा करते हैं। यह प्रारंभिक पद दर्शाता है कि महानतम देवगण भी माता की नित्य स्तुति करते हैं।
2
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
आप ही उमा (पार्वती), रमा (स्वयं लक्ष्मी) और ब्रह्माणी (सरस्वती) हैं — आप ही समस्त जगत की माता हैं। सूर्य, चंद्रमा और ऋषि नारद सभी आपका ध्यान करते हैं और आपके गुण गाते हैं। यह पद लक्ष्मी जी को सर्वोच्च देवी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।
3
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख-सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
दुर्गा के रूप में आप निरंजनी हैं, सुख और सम्पत्ति देने वाली हैं। जो भी आपका ध्यान करता है, उसे ऋद्धि-सिद्धि और धन की प्राप्ति होती है। यह पद लक्ष्मी जी को दुर्गा के साथ अभिन्न बताता है — सौभाग्य और शक्ति की देवी एक ही हैं।
4
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता॥
आप पाताललोक में भी निवास करती हैं और आप ही समस्त शुभफलों की दाता हैं। आप कर्म के प्रभाव को प्रकाशित करती हैं और भवसागर (संसार-सागर) से रक्षा करती हैं। यह पद लक्ष्मी जी की सर्वव्यापकता को दर्शाता है।
5
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
कर शुभ काज प्रकट हो, दुख-दारिद्र्य जाता॥
जिस घर में आप निवास करती हैं, वहाँ सभी सद्गुण आते हैं। जब आप शुभ कार्यों में प्रकट होती हैं, तो दुख और दारिद्र्य दूर हो जाते हैं। माना जाता है कि पूजा, स्वच्छता और धर्माचरण द्वारा घर में लक्ष्मी का आह्वान करने से घर का भाग्य बदल जाता है।
6
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
आपके बिना कोई यज्ञ सम्पन्न नहीं हो सकता और किसी को वस्त्र नहीं मिल सकते। खान-पान और भौतिक समृद्धि का सारा वैभव आप ही से आता है। यह पद लक्ष्मी जी को समस्त भौतिक पोषण और धार्मिक अनुष्ठानों की मूल शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।
7
शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
आप शुभ गुणों का सुंदर मंदिर हैं और क्षीरसागर (दूध का सागर) से प्रकट हुई हैं। आपके बिना समुद्र-मंथन से निकले चौदह रत्न कोई नहीं पा सकता। यह पद समुद्र-मंथन की पौराणिक कथा का संदर्भ देता है जिसमें लक्ष्मी जी स्वयं सागर से प्रकट हुई थीं।
8
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥
जो भी इस महालक्ष्मी जी की आरती को गाता है, उसके हृदय में आनंद समा जाता है और उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। यह अंतिम पद आरती का स्वयं का आशीर्वाद है — आरती गाने का कार्य ही हृदय को शुद्ध करता है।