स्तोत्र

श्री महालक्ष्म्यष्टकम् Śrī Mahālakṣmyaṣṭakam

श्री महालक्ष्म्यष्टकम् पद्म पुराण से उद्धृत एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है, जिसकी रचना देवराज इन्द्र ने देवी महालक्ष्मी की स्तुति में की थी। इसमें आठ मुख्य श्लोक हैं, प्रत्येक 'महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते' के

11 श्लोक · 7 मिनट पाठ · शाक्त
1
इन्द्र उवाच।
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
इन्द्र बोले: हे महामाये! श्रीपीठ में विराजमान, देवताओं द्वारा पूजित आपको नमस्कार है। हे शंख, चक्र और गदा को हाथों में धारण करने वाली! हे महालक्ष्मि! आपको नमस्कार है।
2
नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
हे गरुड पर आरूढ होने वाली! कोलासुर को भय देने वाली! हे सभी पापों को हरने वाली देवी, हे महालक्ष्मि! आपको नमस्कार है।
3
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयंकरि।
सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
हे सर्वज्ञ! सभी वरदान देने वाली! सभी दुष्टों को भय देने वाली! हे सभी दुःखों को हरने वाली देवी, हे महालक्ष्मि! आपको नमस्कार है।
4
सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि।
मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
हे सिद्धि और बुद्धि देने वाली देवी! भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली! हे सदा मन्त्र-मूर्ति देवी, हे महालक्ष्मि! आपको नमस्कार है।
5
आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्ति महेश्वरि।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
हे आदि और अन्त से रहित देवी! हे आदिशक्ति, महेश्वरि! हे योग से उत्पन्न, योग से प्रकट होने वाली! हे महालक्ष्मि! आपको नमस्कार है।
6
स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ते महोदरे।
महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
हे स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूपों में विद्यमान, महारौद्र रूपिणी! हे महाशक्ते, महोदरे! हे महापापों को नष्ट करने वाली देवी, हे महालक्ष्मि! आपको नमस्कार है।
7
पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि।
परमेशि जगन्मातर् महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
हे कमल के आसन पर स्थित देवी! परब्रह्म के स्वरूप! हे परमेशि, जगत की माता! हे महालक्ष्मि! आपको नमस्कार है।
8
श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते।
जगत्स्थिते जगन्मातर् महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
हे श्वेत वस्त्र धारण करने वाली देवी! अनेक आभूषणों से सुशोभित! हे जगत में स्थित, जगन्माता! हे महालक्ष्मि! आपको नमस्कार है।
9
महालक्ष्म्यष्टकस्तोत्रं यः पठेद् भक्तिमान् नरः।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा॥
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्र का पाठ करता है, वह सर्वसिद्धि प्राप्त करता है और सदा राज्य (समृद्धि) को प्राप्त होता है।
10
एककाले पठेन् नित्यं महापापविनाशनम्।
द्विकालं यः पठेन् नित्यं धनधान्यसमन्वितः॥
जो एक बार नित्य पाठ करता है, उसके महापाप नष्ट होते हैं। जो दो बार नित्य पाठ करता है, वह धन और धान्य से समृद्ध होता है।
11
त्रिकालं यः पठेन् नित्यं महाशत्रुविनाशनम्।
महालक्ष्मीर्भवेत् तस्य प्रसन्ना वरदा शुभा॥
जो तीन बार नित्य पाठ करता है, उसके महाशत्रु नष्ट होते हैं। उसके लिए महालक्ष्मी स्वयं प्रसन्न, वरदायिनी और मङ्गलमयी हो जाती हैं।