आरती
जय गणेश जय गणेश देवा Jaya Gaṇeśa jaya Gaṇeśa devā
गणेश आरती — 'जय गणेश जय गणेश देवा' से प्रारम्भ होने वाली — भगवान गणेश की सर्वाधिक लोकप्रिय स्तुति है। पूजा के अन्त में की जाने वाली यह आरती दीप और गीत का अन्तिम समर्पण है। गणेश विघ्नहर्ता और नव-आरम्भ
1
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
हे गणेश देव, तुम्हारी जय हो! तुम्हारी माता पार्वती हैं और पिता महादेव (शिव) हैं। यह प्रारंभिक स्तुति गणेश जी की दिव्य वंशावली स्थापित करती है और उन्हें पूजा में आमंत्रित करती है।
2
एकदंत दयावंत, चार भुजाधारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥
वे एकदंत हैं — एक दाँतवाले — और दयालु हैं, चार भुजाएँ धारण करते हैं। उनके माथे पर सिंदूर सुशोभित है और वे मूषक (चूहे) पर सवारी करते हैं। एकदंत सत्य की एकता का प्रतीक है; मूषक अहंकार पर विजय का।
3
पान चढ़े, फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
पान चढ़ाया जाता है, फूल चढ़ाए जाते हैं, और मेवा भी अर्पित किए जाते हैं। लड्डुओं का भोग लगाया जाता है और संतजन सेवा करते हैं। लड्डू गणेश जी का प्रिय प्रसाद है; उसका गोल आकार दिव्य ज्ञान की पूर्णता का प्रतीक है।
4
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
वे अंधों को दृष्टि देते हैं, कोढ़ से पीड़ितों को स्वस्थ शरीर देते हैं। बाँझ महिलाओं को पुत्र का वरदान देते हैं और निर्धनों को धन देते हैं। यह पद गणेश जी को करुणामय चमत्कारकर्ता के रूप में प्रस्तुत करता है।
5
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
कवि सूर श्याम आपकी शरण में आए हैं — हे प्रभु, इस सेवा को सफल कीजिए। आपकी माता पार्वती हैं और पिता महादेव हैं। इस अंतिम पद में कवि अपनी याचना करते हैं कि उनकी भक्ति सफल हो।