चालीसा
गणेश चालीसा Gaṇeśa Cālīsā
गणेश चालीसा भगवान गणेश — शिव और पार्वती के हाथी-मुख वाले पुत्र और विघ्नहर्ता — को समर्पित एक चालीस-पद भक्ति-रचना है। इसमें एक आरम्भिक दोहा, चालीस चौपाइयाँ और एक समापन दोहा है — कुल ४२ पद। हिन्दू
1
जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
हे गणपति, सद्गुणों के धाम, कवियों के श्रेष्ठ वदन वाले, कृपालु — विघ्न हरने वाले, मंगल करने वाले, हे गिरिजालाल (पार्वती के पुत्र), जय जय!
2
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥
मंगल भरण करण शुभ काजू॥
हे गणराज गणपति, जय जय जय! आप मंगल के भरणहार और शुभ कार्यों के सम्पादक हैं।
3
जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
हे गजमुख, सुख देने वाले — जय हो! हे विश्व विनायक, बुद्धि के विधाता — जय हो!
4
वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
आपकी वक्र सूँड पवित्र और सुन्दर है; आपके मस्तक पर त्रिपुण्ड तिलक मन को भाने वाला है।
5
राजत मस्तक मुकुट सुहावन।
कोटि सूर्य जिसकी छवि भावन॥
कोटि सूर्य जिसकी छवि भावन॥
आपके मस्तक पर सुन्दर मुकुट शोभायमान है; आपकी छवि करोड़ों सूर्यों के समान मनोरम है।
6
देव शम्भु की शक्ति सँग लाई।
तुम पैदा भये जग हितकाई॥
तुम पैदा भये जग हितकाई॥
देव शम्भु (शिव) की शक्ति से आप उत्पन्न हुए — आप जगत् के हित के लिए अवतरित हुए।
7
अहि मस्तक पर गज मस्तक धारी।
सब जग पूजत तुम्हें नर नारी॥
सब जग पूजत तुम्हें नर नारी॥
आपके दिव्य स्वरूप पर हाथी का मस्तक धारण है — संसार के सभी नर-नारी आपकी पूजा करते हैं।
8
तुम्हारी महिमा पुण्य बखानी।
महाकाय शक्ति बली ज्ञानी॥
महाकाय शक्ति बली ज्ञानी॥
आपकी महिमा पुण्यमय है — आप महाकाय, शक्तिशाली, बलशाली और ज्ञानवान हैं।
9
नाना माल फूल चढ़त तुम पर।
भक्त अर्पण करत सब सुमन वर॥
भक्त अर्पण करत सब सुमन वर॥
अनेक प्रकार की मालाएँ और फूल आप पर चढ़ाए जाते हैं; भक्त आपको सर्वोत्तम सुमन अर्पित करते हैं।
10
दुर्वादल गणपति जो चढ़ावे।
सब काज हरष मन को पावे॥
सब काज हरष मन को पावे॥
जो गणपति को दूर्वादल (दूब) चढ़ाता है, वह सभी कार्य हर्षित मन से सम्पन्न करता है।
11
विधान सहित पूजा को करते।
कलुष पाप सब नरक निवारते॥
कलुष पाप सब नरक निवारते॥
जो विधि-विधान सहित पूजा करते हैं, उनके समस्त कलुष और पाप नष्ट होते हैं और नर्क से मुक्ति मिलती है।
12
शंकर सुवन भवानी नन्दन।
शुभ गुण धाम जगत जन वन्दन॥
शुभ गुण धाम जगत जन वन्दन॥
हे शंकर के पुत्र, भवानी के नन्दन — शुभ गुणों के धाम, जगत् के सभी जनों द्वारा वन्दित।
13
ऋद्धि सिद्धि तुम्हारी दासी।
कमला भी सेवन में राशी॥
कमला भी सेवन में राशी॥
ऋद्धि और सिद्धि आपकी दासियाँ हैं; लक्ष्मी भी आपकी सेवा में तत्पर हैं।
14
सर्व दोष जो कहीं समाये।
शुभ काज नहिं होत बिन आये॥
शुभ काज नहिं होत बिन आये॥
जब तक आप नहीं आते, सभी दोष बने रहते हैं — आपके बिना कोई शुभ कार्य नहीं होता।
15
पान सुपारी चढ़त भोग में।
दीप धूप लाजा फल योग में॥
दीप धूप लाजा फल योग में॥
पान और सुपारी भोग में चढ़ाई जाती है; दीप, धूप, लाजा और फल पूजा में अर्पित किए जाते हैं।
16
अंकुश पाश धारण करते हो।
ऋद्धि सिद्धि सहित विचरते हो॥
ऋद्धि सिद्धि सहित विचरते हो॥
आप अंकुश और पाश धारण करते हैं; ऋद्धि और सिद्धि के साथ विचरण करते हैं।
17
विघ्न विनाशन मंगल दाता।
तुम भक्तन के सुखदाता विख्याता॥
तुम भक्तन के सुखदाता विख्याता॥
हे विघ्न-विनाशन, मंगल-दाता — आप अपने भक्तों को सुख देने वाले विख्यात देवता हैं।
18
प्रकट स्वरूप शक्ति अनुहारी।
पाती पद पाटी निज धारी॥
पाती पद पाटी निज धारी॥
आपका प्रकट स्वरूप दिव्य शक्ति का अनुसरण करता है; आप अपनी पदवी के चिह्न स्वयं धारण करते हैं।
19
जटा जूट विराजत मस्तक।
जटा जाल विलम्बित तट कट॥
जटा जाल विलम्बित तट कट॥
आपके मस्तक पर जटा-जूट विराजती है; जटाओं का जाल आपके कपोलों पर लटकता है।
20
मोदक तुम्हें अति प्रिय लागे।
भक्त जन हर्षित होकर जागे॥
भक्त जन हर्षित होकर जागे॥
मोदक आपको अत्यन्त प्रिय है; भक्तजन हर्षित होकर इसे तैयार करने के लिए जाग जाते हैं।
21
नाना भाँति सदा ही पूजत।
नाम जपत मन पाप न छूजत॥
नाम जपत मन पाप न छूजत॥
अनेक प्रकार से सदा आपकी पूजा होती है; आपका नाम जपने से मन पाप से अछूता रहता है।
22
सुनन को सब चाहत जाहीं।
किन्तु न देहि अपना बताहीं॥
किन्तु न देहि अपना बताहीं॥
सभी आपकी महिमा सुनना चाहते हैं; किन्तु आप अपना परम-स्वरूप सबको नहीं बताते।
23
जय जय गणपति जगत उजागर।
नाम जपत निशि दिन मन मागर॥
नाम जपत निशि दिन मन मागर॥
जय जय गणपति, जगत् को उजागर करने वाले — रात-दिन नाम जपने से मन उन्नत होता है।
24
तुम्हारे भजन राम को पावें।
जन्म जन्म के पाप नसावें॥
जन्म जन्म के पाप नसावें॥
आपके भजन से राम की प्राप्ति होती है; जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं।
25
शनि जब सिर पर बाल विनाशे।
तुम गज मुण्ड धर सब पर राजे॥
तुम गज मुण्ड धर सब पर राजे॥
जब शनि की दृष्टि ने बालावस्था में आपका मूल सिर नष्ट कर दिया, तब आपने गज-मुण्ड धारण कर सभी पर राज्य किया।
26
पार्वती माँ की ममता भारी।
तुम सहित शोक हरत दुखहारी॥
तुम सहित शोक हरत दुखहारी॥
माता पार्वती की ममता आपके प्रति अपार है; आप माता सहित दुःख और शोक हरते हैं।
27
शिव सुत बैठे सिंहासन ऊपर।
तुम प्रथम पूज्य सब मानत सत्य॥
तुम प्रथम पूज्य सब मानत सत्य॥
हे शिव-पुत्र, सिंहासन पर विराजमान — सभी आपको प्रथम पूज्य मानते हैं, यह सत्य है।
28
चार भुज तुम विश्व विहारी।
सुन्दर मूर्ति विलसत भारी॥
सुन्दर मूर्ति विलसत भारी॥
चार भुजाओं वाले आप विश्व में विहार करते हैं; आपकी सुन्दर मूर्ति अत्यन्त विलसित है।
29
गण गणेश गोसाईं कृपाला।
पाद पंकज नित धरत नर चाला॥
पाद पंकज नित धरत नर चाला॥
हे गणेश स्वामी, कृपालु — लोग सदा आपके चरण-कमलों पर अपने कदम रखते हैं।
30
धूप दीप अरु माल फुलावन।
भक्त जन प्रभु को नित ध्यावन॥
भक्त जन प्रभु को नित ध्यावन॥
धूप, दीप और फूलों की माला — भक्तजन प्रभु का नित्य ध्यान करते हैं।
31
अष्टभुज तव रूप सुहावन।
सब पर दया करत हो भावन॥
सब पर दया करत हो भावन॥
आपका अष्टभुज रूप सुन्दर है; आप सभी पर दया करते हुए मन को भाते हैं।
32
दीनन की लाज रखत नित आपा।
दुःख दर्द सभी नसावत पापा॥
दुःख दर्द सभी नसावत पापा॥
आप सदा दीनों की लाज रखते हैं; दुःख, दर्द और समस्त पापों का नाश करते हैं।
33
भक्त की आन रखत प्रभु मेरे।
भव जल से उतारत तट तेरे॥
भव जल से उतारत तट तेरे॥
हे मेरे प्रभु, आप भक्त की आन रखते हैं; संसार-सागर से पार कर अपने तट पर पहुँचाते हैं।
34
विद्या वारिधि बुद्धि विधाता।
धन धान्य सम्पदा के दाता॥
धन धान्य सम्पदा के दाता॥
आप विद्या के सागर, बुद्धि के विधाता और धन-धान्य-सम्पदा के दाता हैं।
35
सभी मनोरथ पूर्ण करावत।
भक्तन को सुख-सम्पदा देत॥
भक्तन को सुख-सम्पदा देत॥
आप सभी मनोरथों को पूर्ण करते हैं; भक्तों को सुख और सम्पदा प्रदान करते हैं।
36
चारों युग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
चारों युगों में आपका प्रताप विद्यमान है; आप जगत् में प्रसिद्ध प्रकाश-स्वरूप हैं।
37
मातु-पिता तुम्हारे हम दासा।
कीजै नाथ हृदय में वासा॥
कीजै नाथ हृदय में वासा॥
हे नाथ, हम आपके तथा आपके माता-पिता के दास हैं; कृपया हमारे हृदय में निवास करें।
38
जो यह पाठ करे चालीसा।
सो सिद्धि प्राप्त करे नित नीसा॥
सो सिद्धि प्राप्त करे नित नीसा॥
जो इस चालीसा का पाठ करता है, वह नित्य-प्रति सिद्धि प्राप्त करता है।
39
संकट में जो गणपति ध्यावे।
सो अपनी आपद से मुक्त पावे॥
सो अपनी आपद से मुक्त पावे॥
जो संकट में गणपति का ध्यान करता है, वह अपनी आपदा से मुक्त हो जाता है।
40
जो गण गणेश निरंतर ध्यावे।
सो मोक्ष का अधिकारी पावे॥
सो मोक्ष का अधिकारी पावे॥
जो निरन्तर गणेशजी का ध्यान करता है, वह मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।
41
श्री गणेश यह चालीसा पाठा।
कीन्ह तुलसीदास कहि जग माथा॥
कीन्ह तुलसीदास कहि जग माथा॥
श्री गणेश की यह चालीसा का पाठ किया गया — जग में शिरोमणि की प्रशंसा करते हुए।
42
जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
हे सद्गुणों के धाम, कवियों के श्रेष्ठ वदन वाले कृपालु गणपति, विघ्न हरने वाले, मंगल करने वाले, हे गिरिजालाल, जय जय!