चालीसा

शिव चालीसा Śiva Cālīsā

शिव चालीसा भगवान शिव को समर्पित एक चालीस-छंदीय भक्ति-काव्य है, जो मध्यकालीन अवधी हिंदी की चौपाई-दोहा शैली में रचा गया है — वही शैली जो रामचरितमानस और हनुमान चालीसा में भी उपयोग हुई है। प्रारंभ और

42 श्लोक · 10 मिनट पाठ · शैव
1
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
जय गणेश, गिरिजापुत्र, जो मंगल के मूल और सुजान हैं। अयोध्यादास विनती करते हैं — हे प्रभु, हमें अभय और वरदान दीजिए।
2
जय गिरिजापति दीन दयाला।
सदा करत संतन प्रतिपाला॥
हे गिरिजापति, दीनों पर दयालु, सदा संतों का पालन करने वाले — आपकी जय हो।
3
भाल चंद्रमा सोहत नीके।
कानन कुंडल नागफनी के॥
आपके भाल पर चंद्रमा अत्यंत सुंदर लगता है, कानों में नागफनी के कुंडल सुशोभित हैं।
4
अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुंडमाल तन छार लगाये॥
आपका शरीर गौर वर्ण है, जटाओं से गंगा प्रवाहित है, मुंडमाला धारण किए और तन में भस्म लगाए हैं।
5
वस्त्र खाल बाघांबर सोहे।
छवि को देखि नाग मन मोहे॥
बाघ की खाल का वस्त्र धारण किए सुशोभित हैं, आपकी छवि देखकर नागों का मन भी मोहित हो जाता है।
6
मैना मातु की हवे दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
मैना माता की लाड़ली पार्वती आपके बाम अंग में सुशोभित हैं, उनकी छवि अनूठी है।
7
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
हाथ में त्रिशूल की छवि अत्यंत भव्य है, जो सदा शत्रुओं का विनाश करती है।
8
नंदि गणेश सोहे तेहि ठाऊ।
बरगद बाम भृंगी नृत्यधाऊ॥
उस स्थान पर नंदि और गणेश सुशोभित हैं, बाईं ओर बरगद के पास भृंगी तीव्र गति से नृत्य कर रहे हैं।
9
भूत प्रेत पिशाच निवासी।
करहिं सेव सब हर के दासी॥
भूत, प्रेत और पिशाच जो शिव के साथ निवास करते हैं, सभी उनकी सेवा में दास बनकर लगे रहते हैं।
10
शिव शंकर परमेश्वर भारी।
सुर नर मुनि करहिं जयकारी॥
शिव शंकर परमेश्वर महान हैं, देव, मनुष्य और मुनि सभी उनकी जयकार करते हैं।
11
जटाधारी गंग बहाई।
तीनों लोकन के दुख नसाई॥
जटाधारी शिव की जटाओं से गंगा प्रवाहित है, वे तीनों लोकों के दुख नष्ट करते हैं।
12
दक्ष यज्ञ बिन बुलाए आई।
सती ने देह अग्नि में जाई॥
सती बिन बुलाए दक्ष-यज्ञ में आईं और जब शिव का अपमान हुआ, उन्होंने अग्नि में अपनी देह अर्पित कर दी।
13
शिव तब गए वन तपस्या लाई।
जग से लिए मन वैराग रुखाई॥
तब शिव वन में तपस्या करने चले गए, मन में जगत से वैराग्य लेकर।
14
उमा जन्म लिय शिव हित धाई।
पर्वत पुत्री भई मनभाई॥
उमा ने शिव के हित में जन्म लेकर दौड़ लगाई, वे पर्वतराज की प्रिय पुत्री बनीं।
15
कठिन तप करि शिव मन भाया।
पारवती ने वर निज पाया॥
कठिन तपस्या करके शिव को प्रसन्न किया और पार्वती ने अपना मनचाहा वर पाया।
16
शिव गौरी विवाह रचाए।
देवन सुर मिलि मंगल गाए॥
शिव और गौरी का विवाह रचाया गया, देवों और सुरों ने मिलकर मंगल गाए।
17
गणेश कार्तिकेय जन्म भए।
देवन को अति हर्ष दए॥
गणेश और कार्तिकेय का जन्म हुआ, शिव के इन दोनों पुत्रों ने देवताओं को अत्यंत हर्षित किया।
18
सागर मंथन में विष जाई।
देवन तब अरदास लगाई॥
सागर मंथन में विष प्रकट हुआ, तब देवताओं ने शिव के आगे अरदास लगाई।
19
शिव दयाल विष पीया धारी।
रखि लिया जग के हितकारी॥
दयालु शिव ने विष पीकर कंठ में धारण किया, जगत के हितकारी बनकर उसकी रक्षा की।
20
नीलकंठ नाम तब पाए।
जगत के संकट दूर भगाए॥
तब नीलकंठ नाम पाए, जगत के संकट को दूर भगाया।
21
त्रिपुरासुर महा दुराचारी।
हर ने बाण एक में संहारी॥
महा दुराचारी त्रिपुरासुर का शिव ने एक ही बाण से संहार किया।
22
देवन तब आनंद मनाया।
शिव की जय जय जग में गाया॥
तब देवताओं ने आनंद मनाया, जगत में शिव की जय-जयकार हुई।
23
जलंधर असुर जब उठ धाया।
शिव से युद्ध मान ले आया॥
जब जलंधर असुर उठकर दौड़ा, शिव से युद्ध का अभिमान लेकर आया।
24
शिव ने किया जलंधर नाशा।
भक्त हर्षित भई मन आशा॥
शिव ने जलंधर का नाश किया, भक्त हर्षित हुए और उनके मन की आशाएं पूरी हुईं।
25
कैलाश पर शिव नित्य विराजे।
भक्तन के मन में आनंद छाजे॥
कैलाश पर शिव नित्य विराजते हैं, भक्तों के मन में आनंद छा जाता है।
26
द्वादश ज्योतिर्लिंग जग में बाजे।
सोमनाथ आदि सबसे राजे॥
द्वादश ज्योतिर्लिंग जगत में विख्यात हैं, सोमनाथ आदि सबसे पहले राजते हैं।
27
मल्लिकार्जुन भीमशंकर साजे।
त्र्यंबकेश्वर नागेश्वर राजे॥
मल्लिकार्जुन और भीमशंकर सुशोभित हैं, त्र्यंबकेश्वर और नागेश्वर राजते हैं।
28
केदारनाथ वैद्यनाथ धामा।
घुश्मेश्वर शिव पूरन कामा॥
केदारनाथ, वैद्यनाथ धाम और घुश्मेश्वर — इन स्थानों पर शिव सभी की कामनाएं पूर्ण करते हैं।
29
ओंकार महाकाल रामेशा।
अमरेश्वर हर भव के क्लेशा॥
ओंकारेश्वर, महाकालेश्वर, रामेश्वर, अमरेश्वर — ये सब शिव के रूप हैं जो भव के क्लेश हरते हैं।
30
काशी पावन तीरथ भारी।
मुक्ति देत हर भव दुखहारी॥
काशी महान पवित्र तीर्थ है, जहाँ हर (शिव) भव के दुख हरकर मुक्ति देते हैं।
31
जो ध्यावत शिव चित लाई।
पावत सुख संपत मनभाई॥
जो शिव का चित्त लगाकर ध्यान करता है, वह मनचाही सुख-संपत्ति पाता है।
32
भक्त जनन हर देत रिद्धि।
शिव सेवन से बाढ़त सिद्धि॥
भक्तजनों को शिव ऋद्धि देते हैं, शिव की सेवा से सिद्धि बढ़ती है।
33
पुत्र धन यश सब कुछ पाई।
शिव की महिमा जग में छाई॥
पुत्र, धन, यश — सब कुछ पाया जाता है, जगत में शिव की महिमा छाई हुई है।
34
मनोकामना शिव पूरि करहीं।
जो संकट में उनको सिमरहीं॥
शिव उनकी मनोकामना पूर्ण करते हैं जो संकट में उनका स्मरण करते हैं।
35
दुःख रोग भय शिव नसावत।
भक्त के मन में आनंद लावत॥
दुःख, रोग और भय को शिव नष्ट करते हैं, भक्त के मन में आनंद लाते हैं।
36
जन्म जन्म के पाप हरेता।
शिव की कृपा से मोक्ष देता॥
जन्म-जन्मांतर के पाप हरने वाले शिव अपनी कृपा से मोक्ष देते हैं।
37
अंत शिवपुर धाम पठावत।
अटल भक्त को मुक्ति दिलावत॥
अंत में शिवपुर धाम पहुंचाते हैं, अटल भक्त को मुक्ति दिलाते हैं।
38
जब जग त्राहि त्राहि कर भारी।
तब शिव आवत भक्त-हितकारी॥
जब जगत में भारी हाहाकार मचता है, तब शिव भक्त-हितकारी बनकर आते हैं।
39
शिव की कृपा से भव भय नासे।
जग में सुख संपत गुण पासे॥
शिव की कृपा से भव का भय नष्ट होता है, जगत में सुख, संपत्ति और गुण प्राप्त होते हैं।
40
जो यह चालीसा नित गावत।
ताको शिव सब मनमाँगत पावत॥
जो यह चालीसा नित्य गाता है, उसे शिव सब मनमाँगी चीजें देते हैं।
41
कहत अयोध्यादास यह वाणी।
शिव चालीसा पावन खानी॥
अयोध्यादास यह वाणी कहते हैं — शिव चालीसा पावनता की खान है।
42
नित नेम उठि प्रातही, पाठ करो चालीस।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
प्रतिदिन नियम से प्रातःकाल उठकर चालीसा का पाठ करो। हे जगदीश, मेरी मनोकामना पूर्ण करो।