चालीसा

हनुमान चालीसा Hanumān Cālīsā

हनुमान चालीसा संत-कवि गोस्वामी तुलसीदास (लगभग 1532–1623 ई.) द्वारा अवधी भाषा में रचित चालीस पदों की भक्तिमय रचना है। यह उनकी विनय-पत्रिका का अंग है और आज हिन्दू जगत् में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली

43 श्लोक · 12 मिनट पाठ · वैष्णव
1
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
श्री गुरु के चरण कमलों की धूल से अपने मन के दर्पण को शुद्ध करके, मैं रघुवर (राम) के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों फल प्रदान करता है।
2
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
अपने तन को बुद्धिहीन जानकर मैं पवनपुत्र (हनुमान) का स्मरण करता हूँ। हे हनुमान, मुझे बल, बुद्धि और विद्या दो और मेरे क्लेशों तथा विकारों को दूर करो।
3
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
हे ज्ञान और गुण के सागर हनुमान, आपकी जय हो! हे तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाले कपीश्वर, आपकी जय हो!
4
राम दूत अतुलित बल धामा।
अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
हे राम के दूत, अतुलनीय बल के धाम — आपका नाम अञ्जनि-पुत्र और पवनसुत है।
5
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
हे महावीर, पराक्रमी, वज्र-अंगी — आप कुमति का नाश करने वाले और सुमति के साथी हैं।
6
कञ्चन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुण्डल कुञ्चित केसा॥
आपका वर्ण सुनहला है, वेश-भूषा दिव्य है; कानों में कुण्डल और घुँघराले बाल हैं।
7
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
आपके हाथों में वज्र और ध्वजा विराजती है; कंधे पर मूँज की जनेऊ सुशोभित है।
8
शंकर सुवन केसरी नन्दन।
तेज प्रताप महा जग वन्दन॥
हे शंकर के पुत्र, हे केसरी-नन्दन — आपके तेज और प्रताप की सारे जग में वन्दना होती है।
9
बिद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
आप विद्यावान, गुणी और अत्यंत चतुर हैं; राम का कार्य करने के लिए सदा आतुर रहते हैं।
10
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
आप प्रभु के चरित्र सुनने में रसिक हैं; आपके मन में राम, लक्ष्मण और सीता निवास करते हैं।
11
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
सूक्ष्म रूप धारण करके आपने सीता को दर्शन दिया; विकट रूप धारण करके लंका को जलाया।
12
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचन्द्र के काज सँवारे॥
भीम रूप धारण करके आपने असुरों का संहार किया और रामचन्द्र के कार्यों को सुलझाया।
13
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
संजीवनी बूटी लाकर आपने लक्ष्मण को जीवित किया; श्री रघुवीर ने प्रसन्न होकर आपको हृदय से लगाया।
14
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
रघुपति ने आपकी बहुत बड़ाई की और कहा — 'तुम मुझे मेरे प्रिय भाई भरत के समान हो।'
15
सहस बदन तुम्हारो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं॥
'तुम्हारी कीर्ति सहस्र-मुख (शेषनाग) भी गाते हैं' — ऐसा कहकर श्रीपति ने आपको कण्ठ से लगाया।
16
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
सनकादि मुनि, ब्रह्मादि देव, नारद, सरस्वती और शेषनाग — सभी आपकी महिमा गाते हैं।
17
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कबि कोबिद कहि सकैं कहाँ ते॥
यम, कुबेर, दिक्पाल — कवि और विद्वान् आपकी महिमा का कहाँ तक वर्णन कर सकते हैं?
18
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राजपद दीन्हा॥
आपने सुग्रीव पर उपकार किया — राम से मिलवाकर उन्हें राजपद दिलाया।
19
तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भये सब जग जाना॥
विभीषण ने आपका मन्त्र माना और वे लंकेश्वर बने — यह सारा जग जानता है।
20
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
युगों के हजारों योजन दूर स्थित सूर्य को आपने मीठा फल समझकर निगल लिया — यह आपकी बाललीला थी।
21
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
प्रभु की मुद्रिका मुँह में रखकर आप समुद्र पार कर गए — इसमें कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि आपके लिए कुछ भी असम्भव नहीं।
22
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
इस संसार के जितने भी दुर्गम कार्य हैं, वे सब आपकी कृपा से सुगम हो जाते हैं।
23
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
आप राम के द्वार के रखवाले हैं; आपकी आज्ञा के बिना कोई प्रवेश नहीं कर सकता।
24
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रच्छक काहू को डर ना॥
जो आपकी शरण में आता है, उसे सब सुख मिलते हैं; जब आप रक्षक हों तो किसी का भय नहीं।
25
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक ते काँपै॥
आप अपने तेज को स्वयं ही सम्भाल सकते हैं; आपकी हुँकार से तीनों लोक काँप उठते हैं।
26
भूत पिशाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
जब महावीर का नाम सुनाई देता है, तो भूत-पिशाच पास नहीं आते।
27
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा॥
निरन्तर हनुमत-वीर का जप करने से रोग नष्ट होते हैं और सभी पीड़ाएँ दूर होती हैं।
28
संकट ते हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
जो मन, कर्म और वचन से हनुमानजी का ध्यान करता है, वे उसे सभी संकटों से मुक्त करते हैं।
29
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥
राम सभी पर राज्य करने वाले तपस्वी राजा हैं; उनके समस्त कार्यों को आप ही सम्पन्न करते हैं।
30
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै॥
जो भी कोई कोई मनोरथ (इच्छा) लेकर आपके पास आता है, वह जीवन का असीमित फल प्राप्त करता है।
31
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
चारों युगों में आपका प्रताप विद्यमान है; आप जगत् में प्रसिद्ध प्रकाश-स्वरूप हैं।
32
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकन्दन राम दुलारे॥
आप साधुओं और संतों के रखवाले हैं, असुरों के नाशक हैं, और राम के प्रिय हैं।
33
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥
आप अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों के दाता हैं — यह वरदान माता जानकी ने आपको दिया है।
34
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
राम-भक्ति का रसायन आपके पास है; आप सदा रघुपति के दास बने रहें।
35
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥
आपकी भक्ति (भजन) के द्वारा राम की प्राप्ति होती है और जन्म-जन्मान्तर के दुख भूल जाते हैं।
36
अन्त काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥
अन्तिम काल में रघुवर के धाम जाते हैं और जहाँ भी जन्म लें, हरिभक्त कहलाते हैं।
37
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेई सर्व सुख करई॥
किसी और देवता पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं; केवल हनुमानजी की सेवा से ही सब सुख मिलते हैं।
38
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जो व्यक्ति बलवीर हनुमान का स्मरण करता है, उसके सभी संकट कटते हैं और सभी पीड़ाएँ मिटती हैं।
39
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
हे स्वामी हनुमान, जय जय जय हो! गुरुदेव की भाँति मुझ पर कृपा करो।
40
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बन्दि महा सुख होई॥
जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है, वह बन्धनों से मुक्त होकर महान सुख प्राप्त करता है।
41
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
जो इस हनुमान चालीसा का पाठ करता है, उसे सिद्धि प्राप्त होती है — इसके साक्षी गौरीश (शिव) हैं।
42
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥
तुलसीदास सदा हरि के सेवक हैं — हे नाथ, मेरे हृदय में निवास करें।
43
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
हे पवनपुत्र, संकट-हरण करने वाले, मंगलमूर्ति — हे देवों के राजा, राम, लक्ष्मण और सीता सहित मेरे हृदय में निवास करें।