स्तोत्र
महामृत्युञ्जय मन्त्र Mahāmṛtyuñjaya Mantra
महामृत्युञ्जय मन्त्र सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय के सर्वाधिक शक्तिशाली और जनप्रिय मन्त्रों में से है। इसका मूल स्वरूप ऋग्वेद के सातवें मण्डल (RV 7.59.12) में है, जिसे परम्परागत रूप से ऋषि वसिष्ठ अथवा बालक
1
त्र्यम्बकं सदाशिवं शान्तं शशाङ्कमुकुटान्वितम् ।
ब्रह्मविष्ण्विन्द्रसेव्यं च महामृत्युञ्जयं भजे ॥
ब्रह्मविष्ण्विन्द्रसेव्यं च महामृत्युञ्जयं भजे ॥
मैं शान्तस्वरूप, चन्द्रमुकुट से अलंकृत, ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र द्वारा सेवित त्रिनेत्र सदाशिव महामृत्युञ्जय को भजता हूँ।
2
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥
हम त्रिनेत्र सर्वव्यापी शिव की आराधना करते हैं जो समस्त प्राणियों का पोषण करते हैं। जिस प्रकार पका ककड़ी लता से स्वतः मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार वे हमें मृत्यु के बन्धन से मुक्त करें — किन्तु अमृतत्व से नहीं।
3
नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च ।
नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
मंगलदायी शम्भु को और आनन्ददायी मयोभव को नमस्कार; शुभकारी शङ्कर को और सुखप्रदायी मयस्कर को नमस्कार; शिव को और परमशिव को नमस्कार।
4
महादेवाय विद्महे मृत्युञ्जयाय धीमहि ।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
हम महादेव को जानें; मृत्युञ्जय का ध्यान करें। वह रुद्र हमारी बुद्धि को प्रकाशित और प्रेरित करे।
5
मृत्युञ्जयाय रुद्राय नीलकण्ठाय शम्भवे ।
अमृतेशाय शर्वाय महादेवाय ते नमः ॥
अमृतेशाय शर्वाय महादेवाय ते नमः ॥
मृत्युञ्जय, रुद्र, नीलकण्ठ, शम्भु, अमृतेश, शर्व और महादेव — आपको नमस्कार।
6
मृत्युञ्जयाख्यं स्तवनं यः करोति प्रयत्नतः ।
स विजेत्य महामृत्युं लभते परमां गतिम् ॥
स विजेत्य महामृत्युं लभते परमां गतिम् ॥
जो इस मृत्युञ्जय स्तुति का प्रयत्नपूर्वक पाठ करता है, वह महामृत्यु को जीतकर परम पद को प्राप्त होता है।
7
आयुरारोग्यमैश्वर्यं शत्रुनाशो यशस्करम् ।
त्र्यम्बकस्य प्रसादेन सर्वसिद्धिः प्रजायते ॥
त्र्यम्बकस्य प्रसादेन सर्वसिद्धिः प्रजायते ॥
दीर्घायु, स्वास्थ्य, ऐश्वर्य, शत्रुनाश और यश — त्र्यम्बक की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है।