चालीसा

कृष्ण चालीसा Kṛṣṇa Cālīsā

कृष्ण चालीसा भगवान श्री कृष्ण की स्तुति में रचा गया चालीस चौपाइयों का लोकप्रिय हिन्दी भक्तिकाव्य है। इसमें दो दोहों के मध्य चालीस चौपाइयाँ हैं जो कृष्ण के सम्पूर्ण जीवन-वृत्त को काव्य में प्रस्तुत

42 श्लोक · 10 मिनट पाठ · वैष्णव
1
नन्द-नन्दन नाम तेरो, कृष्ण मुरारी श्याम ।
भक्तन के हृदय-कमल में, करो सदा विश्राम ।।
तुम्हारा नाम है नन्द के नन्दन, कृष्ण, मुरारी, श्याम। भक्तों के हृदय-कमल में सदा विराजो।
2
जय जय कृष्ण भगत-हितकारी ।
जय मुरलीधर वंशी-धारी ।।
हे भक्त-हितकारी कृष्ण, आपकी जय हो! हे मुरलीधर वंशी-धारी, आपकी जय हो!
3
देवकी के मन-भावन लाला ।
वसुदेव-पुत्र नन्द-नन्दाला ।।
देवकी के मनभावन लाल, वसुदेव के पुत्र, नन्द के आनन्द — यह आप ही हैं।
4
कारागृह में तुमने अवतारा ।
देवों ने जय-जय उच्चारा ।।
मथुरा के कारागृह में आपने अवतार लिया; देवताओं ने जय-जय पुकारी।
5
यमुना के पार पहुँचाए बाबा ।
गोकुल में हुए लाल-मनभावा ।।
बाबा (वसुदेव) ने यमुना के पार पहुँचाया; गोकुल में आप सबके मन-भावन लाल बने।
6
यशोदा-मैया की लाल किलकारी ।
घर-घर में नन्द के गलियारी ।।
यशोदा-मैया के लाल की किलकारियाँ नन्द के घर की हर गली में गूँजती रहीं।
7
पूतना-दैत्य-वध किन्हो बाले ।
त्रिणावर्त को भी मार डाले ।।
बालक रूप में ही पूतना-दैत्य का वध किया और त्रिणावर्त को भी मार डाला।
8
माखन-चोर बड़े मनमोहन ।
गोपियों के मन हरत लुभावन ।।
माखन चुराने वाले बड़े मनमोहन, गोपियों के मन को हर लेने वाले।
9
कालिय-नाग के फन पर नाचे ।
भव-संकट से भक्त को बाँचे ।।
कालिय-नाग के फनों पर नृत्य किया; भव-संकट से भक्तों की रक्षा करते हैं।
10
गोवर्धन गिरि उठायो कर में ।
इन्द्र-गर्व चूर किन्हो पल में ।।
गोवर्धन पर्वत को हाथ पर उठा लिया; पल भर में इन्द्र का गर्व चूर किया।
11
गोपाल गोकुल-वासी गइया-चारे ।
मुरली की धुन से सब दिल हारे ।।
गोकुल के गोपाल, गायें चराने वाले — सबके दिल मुरली की धुन पर मोहित हुए।
12
राधा-प्रिय मधुसूदन प्यारे ।
वृन्दावन-वन में रास पसारे ।।
राधा के प्रिय मधुसूदन — वृन्दावन-वन में रास-लीला फैलाई।
13
महा-रास रचाया वन में जाकर ।
गोपी-गण मगन भए सब आकर ।।
वन में महा-रास रचाया; सब गोपी-गण आकर मगन हो गए।
14
कंस-वध हेतु मथुरा आए ।
अक्रूर संग चलत सुहाए ।।
कंस-वध के लिए मथुरा आए; अक्रूर के साथ सुहावनी यात्रा की।
15
कुवलयापीड गज को मारा ।
कंस-दैत्य का गर्व उतारा ।।
कुवलयापीड हाथी को मार डाला; कंस-दैत्य का घमण्ड उतारा।
16
कंस को जग से मुक्त कराया ।
माता-पिता को बंधन छुड़ाया ।।
कंस को जग से मुक्त किया; माता-पिता को बन्धन से छुड़ाया।
17
सुदामा-सखा बाल-संगाती ।
दीन्ही सम्पदा मिटाई विपत्ती ।।
सुदामा बचपन के साथी थे; आपने सम्पदा दी और विपत्ति मिटाई।
18
द्वारकाधीश राज-दुलारे ।
षोडश-सहस्र पत्नी के प्यारे ।।
द्वारका के अधीश्वर, राज-दुलारे, सोलह हजार पत्नियों के प्रिय।
19
नरकासुर वध कर सुख दाता ।
भक्त-जनों के दुःख के हर्ता ।।
नरकासुर का वध कर सुख देने वाले; भक्त-जनों के दुःख के नाशक।
20
द्रौपदी की लाज तुम बचाई ।
भरी सभा में चीर बढ़ाई ।।
भरी सभा में द्रौपदी की लाज बचाई; चीर बढ़ाते ही गए।
21
पाण्डव-सखा धर्म-प्रतिपाला ।
कुरुक्षेत्र में बाजा भाला ।।
पाण्डवों के मित्र, धर्म के रक्षक — कुरुक्षेत्र में भाला उठाया।
22
अर्जुन-सारथी बने तुम श्याम ।
गीता-ज्ञान दिया निज-काम ।।
हे श्याम, आप अर्जुन के सारथी बने; गीता का ज्ञान दिया।
23
धर्म-स्थापन हेतु अवतारे ।
सज्जन-पालन दुष्ट-संहारे ।।
धर्म-स्थापना के लिए अवतार लेते हैं; सज्जनों की रक्षा करते हैं, दुष्टों का संहार करते हैं।
24
विश्वरूप का दर्शन दीन्हा ।
अर्जुन को ब्रह्म-ज्ञान किन्हा ।।
विश्वरूप का दर्शन दिया; अर्जुन को ब्रह्म-ज्ञान कराया।
25
अनन्य-भक्ति का मार्ग बताया ।
ज्ञान-वैराग्य-योग सिखाया ।।
अनन्य-भक्ति का मार्ग बताया; ज्ञान, वैराग्य और योग सिखाए।
26
सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान देवा ।
करत भक्त तेरी नित्य सेवा ।।
सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान देव — भक्त आपकी नित्य सेवा करते हैं।
27
शंख-चक्र-गदा-पद्म-धारी ।
जग-जग में तुम भव-भव-तारी ।।
शंख-चक्र-गदा-पद्म-धारी — जग-जग में भव-भव-तारी।
28
पीताम्बरधारी मुकुटधारी ।
मयूरपंख-शोभित वनमाली ।।
पीताम्बर और मुकुट धारण किए, मयूर-पंख से शोभित, वनमाला धारण किए।
29
श्यामल-तन मनोहर छाया ।
नयनन में नेह बसाया ।।
श्याम-वर्ण तन, मनोहर छटा, आँखों में प्रेम भरा।
30
अजर-अमर अनन्त-रूपाला ।
तोड़त भव-जन्म-मरण-जाला ।।
अजर-अमर, अनन्त-रूपधारी — जन्म-मरण के भव-जाल को तोड़ने वाले।
31
तुम बिन कौन कृपा जग करहीं ।
तुम बिन कौन भव-सागर तरहीं ।।
तुम्हारे बिना जग पर कृपा कौन करे? तुम्हारे बिना भव-सागर कौन तरे?
32
जप-तप-व्रत-पूजा जब करिहो ।
कृष्ण-भजन मन माहिं धरिहो ।।
जब भी जप-तप-व्रत-पूजा करो, मन में कृष्ण-भजन धारण करो।
33
जो नित कृष्ण-नाम नित जपहीं ।
ताके सब संकट दूर हटहीं ।।
जो नित्य कृष्ण-नाम का जाप करते हैं, उनके सब संकट दूर हो जाते हैं।
34
भक्त-कारज सदा तुम सारो ।
मुरारी नाम निरन्तर धारो ।।
भक्तों का कारज सदा पूरा करते हो; मुरारी नाम को निरन्तर धारण करो।
35
बाँसुरी की स्वर-लहरी अपारा ।
मन मोहत सुनि जग को न्यारा ।।
बाँसुरी की अपार स्वर-लहरी से मन मोहित होता है; जग को न्यारा बना देती है।
36
प्रेम-भक्ति से सेवा कीन्हे ।
मन-वाँछित फल सब उन्हें दीन्हे ।।
जिन्होंने प्रेम-भक्ति से सेवा की, उन्हें मनवाँछित फल मिले।
37
कृष्ण-भजन सुख-मूल कहाई ।
भव-सागर से पार उतराई ।।
कृष्ण-भजन सुख का मूल कहलाता है; भव-सागर से पार उतारता है।
38
जो जन मन-वच-कर्म से ध्यावे ।
सो नर शीघ्र मोक्ष-पद पावे ।।
जो मन-वचन-कर्म से कृष्ण का ध्यान करे, वह शीघ्र मोक्ष-पद पाए।
39
नित पढ़े जो कृष्ण-चालीसा ।
होय पूर्ण मनोरथ इच्छा ।।
जो नित्य कृष्ण-चालीसा पढ़े, उसकी सब मनोकामनाएँ पूर्ण हों।
40
संकट-काल में नाम पुकारे ।
कृष्ण कृपा कर दुःख को टारे ।।
संकट-काल में नाम पुकारो; कृष्ण कृपा करके दुःख टाल देते हैं।
41
पाठ करे यह भक्त-हितैषी ।
पावे सुख-सम्पत्ति अविनाशी ।।
जो इसका पाठ करे, उस भक्त-हितैषी को अविनाशी सुख-सम्पत्ति मिलती है।
42
कृष्ण-चालीसा पाठ से, मिटे सकल भव-पीर ।
श्री कृष्ण-चरण-सेवन करो, हरे दुःख गम्भीर ।।
कृष्ण-चालीसा के पाठ से सभी भव-पीड़ाएँ मिट जाती हैं। श्री कृष्ण के चरण-सेवन करो; गहरे दुःख भी दूर होते हैं।