चालीसा

सरस्वती चालीसा Sarasvatī Cālīsā

सरस्वती चालीसा ज्ञान, विद्या, भाषा, संगीत और कला की देवी माँ सरस्वती को समर्पित चालीस चौपाइयों का भक्तिकाव्य है। यह पारम्परिक हिन्दी चालीसा शैली में है — दो दोहों के मध्य चालीस चौपाइयाँ। इस चालीसे

42 श्लोक · 10 मिनट पाठ · स्मार्त
1
जय माँ सरस्वती शारदा, वाणी-सिद्धि-दायिनी ।
ज्ञान-विद्या-कला दो माँ, भक्तन-हित लावनी ।।
जय माँ सरस्वती शारदा, वाणी-सिद्धि-दायिनी। हे माँ, ज्ञान-विद्या-कला दो और भक्तों का हित करो।
2
जय-जय माँ सरस्वती शारदा भगवानी ।
जगत-माता विद्या-दायिनी ज्ञान-खानी ।।
जगत-माता, विद्या-दायिनी, ज्ञान की खान माँ सरस्वती-शारदा की जय।
3
श्वेत-वसना श्वेत-आसना कमल-विहारी ।
वीणा-धारिणि पुस्तक-हाथ छबि-प्यारी ।।
श्वेत वस्त्रधारिणी, श्वेत कमलासना, वीणाधारिणी, हाथ में पुस्तक लिए सुन्दर रूपवाली।
4
हंस-वाहिनी ब्रह्म-प्रिया सुर-माता ।
संगीत-विद्या-कला-ज्ञान की दाता ।।
हंस-वाहिनी, ब्रह्म-प्रिया, देवों की माता — संगीत, विद्या, कला और ज्ञान की दाती।
5
चारों वेद बनाए तुमने शारदे ।
शास्त्र-पुराण-काव्य दिए भव में दे ।।
हे शारदे, तुमने चारों वेदों की रचना की; शास्त्र, पुराण और काव्य भी दिए।
6
भारती भव-भाषा-माता जगत-वाणी ।
सकल शब्द-विद्या की अधीश्वरानी ।।
भारती, भव-भाषा-माता, जगत की वाणी — सकल शब्द-विद्या की अधीश्वरानी।
7
मधुर-कण्ठ दो माँ कवि-जन को भारी ।
वाक्-सिद्धि दो मम बुद्धि-विचारी ।।
कवि-जनों को मधुर कण्ठ दो माँ; मेरी बुद्धि को वाक्-सिद्धि और विचार-शक्ति दो।
8
विद्यार्थी जो ध्याए माँ तव चरना ।
विद्या-बुद्धि-ज्ञान पावे नव-रचना ।।
जो विद्यार्थी माँ के चरणों का ध्यान करें, वे विद्या-बुद्धि-ज्ञान और नव-सृजन-शक्ति पाएँ।
9
सुर-ताल-लय-गीत-संगीत की माता ।
कला-साधक को मनचाही करो दाता ।।
सुर-ताल-लय-गीत-संगीत की माता — कला-साधकों को मनचाहा फल देने वाली।
10
कमल-हस्ता कमल-वदना कल्याणी ।
जगत-सम्भावित नित्य-पूज्यानी ।।
कमल-हस्ता, कमल-वदना, कल्याणी — जगत द्वारा नित्य पूजित।
11
त्रिशूल-धनु-बाण नहिं तेरे हाथ ।
पुस्तक-वीणा-माला हैं तेरे साथ ।।
तुम्हारे हाथ में त्रिशूल-धनु-बाण नहीं; पुस्तक-वीणा-माला हैं।
12
शस्त्र तुम्हारे शब्द और ज्ञान जानो ।
भव-अज्ञान दूर करो यह मानो ।।
तुम्हारे शस्त्र शब्द और ज्ञान हैं; भव-अज्ञान दूर करने वाली।
13
महामूर्ख को पंडित कर देती हो ।
अज्ञ को ज्ञान-प्रकाश तुम देती हो ।।
महामूर्ख को पंडित बना देती हो; अज्ञानी को ज्ञान का प्रकाश देती हो।
14
ब्रह्मा-सुता ब्रह्मा-मानस-जाई ।
जगत-रचना में अंग तुम पाई ।।
ब्रह्मा की पुत्री, ब्रह्मा के मन से जन्मी — जगत-रचना में तुम्हारा अंग पाया।
15
ऋग्-यजु-साम-अथर्व-निर्मात्री ।
सकल शास्त्र-वेदान्त-परिपात्री ।।
ऋग्, यजुर्, साम और अथर्ववेद की निर्मात्री — समस्त शास्त्र और वेदान्त की पात्री।
16
रामायण महाभारत तव वाणी ।
काव्य-धारा सकल तुमसे पहचानी ।।
रामायण और महाभारत तुम्हारी वाणी से; सकल काव्य-धारा तुमसे है।
17
कवि-लेखक-पाठक सब वन्दन करहीं ।
तव-चरण-सेवा नित-नित जन करहीं ।।
कवि, लेखक और पाठक सब वन्दन करते हैं; नित्य-नित्य आपके चरण-सेवा करते हैं।
18
वसन्त-पंचमी पूजत भक्त प्यारे ।
शारदे-आशीष लेत जन बहु सारे ।।
वसन्त-पञ्चमी को भक्त-जन पूजा करते हैं; अनेक जन शारदे का आशीर्वाद लेते हैं।
19
छात्र-गण सब विद्या-वर माँगत ।
तव कृपा से पावत परीक्षा पाँगत ।।
छात्र-गण विद्या का वर माँगते हैं; तव कृपा से परीक्षा में सफल होते हैं।
20
वाग्मी और वाद-विवाद-विशारदे ।
जय-जय जय देवी जय जगत-शारदे ।।
वाग्मिता और वाद-विवाद में विशारद — हे जगत-शारदे, जय-जय-जय।
21
संस्कृत-भाषा-माता सर्व-भाषा-जाई ।
हिन्दी-नेपाली सब तुमसे पाई ।।
संस्कृत की माता, सभी भाषाओं की जननी — हिन्दी, नेपाली सब तुमसे मिली।
22
श्रुति-स्मृति-षट्-दर्शन तुम विधाता ।
नित-नव-ज्ञान की जगत में दाता ।।
श्रुति, स्मृति और षट्-दर्शन की विधाता — जगत में नित-नव-ज्ञान की दाती।
23
विद्या-बुद्धि-प्रज्ञा दो माँ शारदे ।
अज्ञान-तिमिर हरो शुभ-आशीष दे ।।
हे माँ शारदे, विद्या-बुद्धि-प्रज्ञा दो; अज्ञान के अन्धकार को हरो।
24
पाठशाला विश्वविद्यालय शाला में जाना ।
माँ सरस्वती का करो ध्यान-वखाना ।।
पाठशाला से विश्वविद्यालय तक — सब जगह माँ सरस्वती का ध्यान करो।
25
धन-दौलत से परे जो ज्ञान-धन पाए ।
माँ सरस्वती की महिमा सदा गाए ।।
जो धन-दौलत से परे ज्ञान-धन पाए — वे सदा माँ सरस्वती की महिमा गाएँ।
26
शुभ्र-मूर्ति शुभ्र-वाणी शुभ्र-मनोहरा ।
सकल-सुन्दर तिनु-लोक में तव तनोहरा ।।
शुभ्र-मूर्ति, शुभ्र-वाणी, शुभ्र-मनोहरा — तीनों लोकों में तुम्हारा रूप सकल-सुन्दर।
27
मस्तक पर जिसके तव वरद-हाथ आवे ।
ताके जीवन में ज्ञान-प्रकाश छाए ।।
जिसके मस्तक पर तुम्हारा वरद-हाथ आए — उसके जीवन में ज्ञान का प्रकाश छाए।
28
कान्ति-रूपिणी शान्ति-रूपिणी तुम माता ।
ब्रह्म-तेज से जग में सुख-विधाता ।।
कान्ति-रूपिणी, शान्ति-रूपिणी — ब्रह्म-तेज से जगत में सुख की विधाता।
29
निर्गुण-निराकार तुम भव-सागर-तारी ।
सगुण-साकार माँ भक्त-हित-कारी ।।
निर्गुण-निराकार रूप से भव-सागर तारती हो; सगुण-साकार रूप से भक्त-हित करती हो।
30
कविता-गीत-छन्द-अलंकार-दायी ।
लेखनी-शक्ति माँ तव कृपा पाई ।।
कविता, गीत, छन्द और अलंकार की दायी — लेखनी-शक्ति तुम्हारी कृपा से मिलती है।
31
तुम बिन ज्ञान नहिं जग में कोई पावे ।
तुम बिन विद्या-दीप जले न भावे ।।
तुम्हारे बिना जग में कोई ज्ञान नहीं पाता; तुम्हारे बिना विद्या का दीप नहीं जलता।
32
जप-तप-व्रत-उपवास जो कोई करहीं ।
माँ सरस्वती-नाम नित मन में धरहीं ।।
जो जप-तप-व्रत-उपवास करें — माँ सरस्वती का नाम नित्य मन में धारण करें।
33
नित चालीसा सरस्वती का पढ़हीं ।
विद्या-बुद्धि-ज्ञान सब जन पावहीं ।।
जो नित्य सरस्वती चालीसा पढ़ें, वे सब विद्या-बुद्धि-ज्ञान पाएँ।
34
संकट-काल में माँ को ध्यावत रहना ।
ज्ञान-शक्ति माँ तव से पावत रहना ।।
संकट-काल में माँ का ध्यान करते रहो; माँ से ज्ञान-शक्ति पाते रहो।
35
दीन-दयाला माँ सरस्वती शरणा ।
पाप-दुःख-भव-दर्द सब हरणा ।।
दीन-दयाला माँ सरस्वती की शरण — पाप, दुःख और भव-पीड़ा सब हरने वाली।
36
सन्तान-हित माँ शिक्षा-दीप जलावे ।
छात्र-मन में ज्ञान-रोशनी फैलावे ।।
सन्तानों के हित माँ शिक्षा का दीप जलाती हैं; छात्रों के मन में ज्ञान की रोशनी फैलाती हैं।
37
भाषण-वक्ता-लेखक-गायक-भारी ।
माँ सरस्वती की शरण लहु सब न्यारी ।।
वक्ता, लेखक और गायक — सब माँ सरस्वती की अनुपम शरण लें।
38
जो यह पाठ करे नित शारदे माता ।
ताके मन-वचन-कर्म में ज्ञान-दाता ।।
जो यह पाठ नित्य करे — माँ शारदे उसके मन-वचन-कर्म में ज्ञान-दाती बनती हैं।
39
प्रतियोगिता-परीक्षा में ताके सफलता ।
माँ सरस्वती-कृपा से मिले फलता ।।
प्रतियोगिता और परीक्षा में उन्हें सफलता मिले — माँ सरस्वती की कृपा से।
40
ज्ञान-विज्ञान-दर्शन-शास्त्र की धारा ।
माँ सरस्वती से बही सदा न्यारा ।।
ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और शास्त्र की धाराएँ — माँ सरस्वती से सदा बहती हैं।
41
पाठ करे जो सरस्वती-चालीसा माँ ।
पावे सुख-सिद्धि-सम्पन्न मनोरमा ।।
जो सरस्वती-चालीसा का पाठ करे, माँ — उसे सुख, सिद्धि और मनोरमा प्राप्त हो।
42
सरस्वती-चालीसा पाठ से, हरत अज्ञान-अन्धेर ।
हे माँ शारदा-कृपा से, जीवन हो ज्ञान-उजेर ।।
सरस्वती-चालीसा के पाठ से अज्ञान का अन्धेर हरता है। हे माँ शारदा, कृपा से जीवन ज्ञान-उजाला हो।