स्तोत्र

सरस्वती वन्दना Sarasvatī Vandanā

सरस्वती वन्दना देवी सरस्वती — वाक्, ज्ञान, कला, संगीत, बुद्धि और विद्या की वैदिक देवी — को अर्पित सर्वाधिक प्रचलित प्रार्थना है। सरस्वती त्रिदेवी की तीन प्रमुख देवियों में से एक हैं। उनकी छवि सदैव

7 श्लोक · 6 मिनट पाठ · शाक्त
1
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
जो कुंद-पुष्प, चंद्रमा, तुषार (हिम) और मोतियों की माला के समान धवल (श्वेत) हैं; जो शुभ्र (शुद्ध सफेद) वस्त्र धारण करती हैं; जिनके हाथ वीणा और वरदण्ड से सुशोभित हैं; जो श्वेत कमल पर आसीन हैं; ब्रह्मा, अच्युत (विष्णु), शंकर (शिव) आदि देवों द्वारा जो सदा पूजिता हैं — वे भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें और मेरी समस्त जड़ता को पूर्णतः दूर करें।
2
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमाम् आद्यां जगद्व्यापिनीम्।
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥
उस शारदा (सरस्वती) को नमस्कार जो शुक्ल (श्वेत) हैं, जो ब्रह्मज्ञान की परम सार-स्वरूपा हैं, जो आद्या (प्रथम, प्राचीन) और सर्वव्यापिनी हैं; जो वीणा और पुस्तक (वेद) धारण करती हैं, अभयदायिनी हैं, और जाड्यरूपी अंधकार का नाश करती हैं; जिनके हाथ में स्फटिक माला है और जो कमलासन पर विराजमान हैं — उस परमेश्वरी, बुद्धिप्रदा भगवती को वंदन।
3
सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥
हे सरस्वती, हे वरदायिनी, हे कामरूपिणी! आपको नमस्कार। मैं विद्या का आरम्भ करने जा रहा हूँ — मुझे सदा सिद्धि प्राप्त हो।
4
दोर्भिर्युक्ता चतुर्भिः स्फटिकमणिनिभैरक्षमालान्दधाना हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण।
भासा कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकमणिनिभा भासमाना समाना सा मे वाग्देवता विधतु कुशलं वाणी देवी नमस्ते॥
जो चार भुजाओं से युक्त हैं जिनमें स्फटिक-माणिक माला, श्वेत कमल, शुक (तोता) और पुस्तक धारण की हुई है; जो कुंद, चंद्र, शंख और स्फटिक के समान प्रकाशमान हैं — वे वाग्देवता, देवी वाणी मुझे कुशलता प्रदान करें। हे देवी! आपको नमस्कार।
5
सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने।
विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोऽस्तु ते॥
हे सरस्वती, हे महाभागे, हे विद्यास्वरूपे, हे कमललोचने! हे विशालाक्षि! मुझे विद्या दो — आपको नमस्कार।
6
वेदाय वेदरूपाय वेदान्ताय नमो नमः।
गुणदोषविवर्जिन्यै गुणदोषविधायिनी॥
सर्वज्ञाने सदानन्दे सर्वरूपे नमो नमः।
वेद को, वेदरूपा को, वेदान्त को बार-बार नमस्कार। जो गुण और दोष से परे हैं और गुण-दोष की विधायक भी हैं। सर्वज्ञाना, सदानंदा, सर्वरूपा को बार-बार नमस्कार।
7
सायं प्रातः पठेन्नित्यं षण्मासात् सिद्धिरुच्यते।
चोरव्याघ्रभयं नास्ति पठतां शृण्वतामपि॥
इत्थं सरस्वतीस्तोत्रम् अगस्त्यमुनिवाचकम्।
सर्वसिद्धिप्रदं नृणां सर्वपापप्रणाशनम्॥
जो इसे प्रतिदिन सुबह-शाम पढ़ता है, उसे छः माह में सिद्धि प्राप्त होती है — यह कहा गया है। इसे पढ़ने और सुनने वालों को चोर और व्याघ्र का भय नहीं रहता। इस प्रकार महर्षि अगस्त्य-कृत यह सरस्वती स्तोत्र मनुष्यों को सर्वसिद्धि देने वाला और सर्व पापों का नाशक है।