स्तोत्र
गायत्री मन्त्र (सावित्री स्तुति) Gāyatrī Mantra (Sāvitrī Stuti)
गायत्री मन्त्र सबसे पवित्र वैदिक मन्त्र है, जो ऋग्वेद के तृतीय मण्डल के 62वें सूक्त के दसवें मन्त्र (ऋ.वे. 3.62.10) के रूप में प्रकट है और ऋषि विश्वामित्र को आरोपित है। यह मन्त्र सवितृ देवता — सूर्य
2
ॐ भूः।
ॐ भुवः।
ॐ स्वः।
ॐ महः।
ॐ जनः।
ॐ तपः।
ॐ सत्यम्।
ॐ भुवः।
ॐ स्वः।
ॐ महः।
ॐ जनः।
ॐ तपः।
ॐ सत्यम्।
सात व्याहृतियाँ — अस्तित्व के सात लोकों का प्रतिनिधित्व: भूः (पृथ्वी लोक), भुवः (वायु/अन्तरिक्ष लोक), स्वः (स्वर्ग लोक), महः (प्रकाश), जनः (सृजनात्मक बुद्धि), तपः (तप), सत्यम् (परम सत्य)। सामान्य पाठ में प्रथम तीन व्याहृतियाँ प्रयुक्त होती हैं।
3
ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
ॐ — हम उस परम दिव्य सवितृ के श्रेष्ठ प्रकाश का ध्यान करते हैं, जो भूः, भुवः और स्वः — तीनों लोकों में व्याप्त है। देवता के उस सर्वश्रेष्ठ तेज को, जो सबसे अधिक ग्रहणीय है — हम ध्यान करते हैं; वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।
4
आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो
निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेन आ देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
हिरण्ययेन सविता रथेन आ देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
सवितृ देव, अपने स्वर्णिम रथ पर सवार होकर, कृष्ण (अन्धकार) आकाश में विचरण करते हुए, अमर देवों और मर्त्य मनुष्यों दोनों को विश्राम प्रदान करते हैं। वे सभी लोकों को देखते हुए, सर्वत्र से आते हैं।
5
याति देवः प्रवतः सूर्यः
आयत्या भुवना पश्यन्।
समानमर्थं जनयन् देव निमेषं नो वासयन्नाशु॥
समानमर्थं जनयन् देव निमेषं नो वासयन्नाशु॥
देवता सूर्य तीव्र गति से विचरण करते हैं, आगमन करते हुए सभी लोकों को देखते हैं। हे देव, समस्त प्राणियों में एक समान उद्देश्य उत्पन्न करते हुए, आप क्षण भर में हमें (विश्राम में) स्थिर करते हैं।
6
त्रिर् आ दिवः सवितः सोम्यस्य
वसोर् विभक्तासि मन्दतु त्वा।
यो अस्य काम उत रत्नधेयेषु सः पूषणं पृणत्यव सर्वम्॥
यो अस्य काम उत रत्नधेयेषु सः पूषणं पृणत्यव सर्वम्॥
हे सवितृ, आप स्वर्ग से तीन प्रकार से धन का वितरण करते हैं — सोम-पान आपको प्रसन्न करे। जो कोई भी आपसे रत्न और निधियों की कामना लेकर आता है, आप, पोषण करने वाले, उसकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण करते हैं।
7
प्र देवं देव्यत्रयो
आयत्यभिस्तुवन्ति।
सवितारं सुप्राव्यम्॥
सवितारं सुप्राव्यम्॥
देवगायक ऋषिगण, सवितृ देव के आगमन पर उनकी स्तुति करते हैं — वे जिनका सहज आह्वान किया जा सकता है और जो महान वरदान देते हैं।
8
स सत्यसव ओजसा
वि भाति सवितः शुचिः।
व्यपां सनुतर् आ भरे॥
व्यपां सनुतर् आ भरे॥
वह सवितृ — सत्य प्रेरक, तेजस्वी और शुद्ध — शक्ति से प्रकाशित होते हैं। वे जल के पार भी अपनी (प्रकाश की) भुजाएँ फैलाते हैं।
9
स नो रासत विश्वशंभुवः
सविता स्तोत्रे दिवि श्रवसे।
धत्त रत्नमिषं यशः॥
धत्त रत्नमिषं यशः॥
सवितृ — विश्व के हितैषी — इस स्तोत्र के माध्यम से हमें दिव्य यश प्रदान करें। वे हमें रत्न स्वरूप अन्न (जीवन-संपदा) और कीर्ति प्रदान करें।
10
युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं
परि तस्थुषः।
रोचन्ते रोचना दिवि॥
रोचन्ते रोचना दिवि॥
वे सवितृ के तेजस्वी, लाल-भूरे (अश्व) को आकाश में विचरण करते हुए जोड़ते हैं। सूर्य के प्रकाश-बिन्दु स्वर्ग में चमकते हैं।
11
युञ्जन्त्यस्य काम्या
हरितः शतयुज्यः।
परि भुवनानि विश्वा॥
परि भुवनानि विश्वा॥
उनके प्रिय, पीताभ-श्याम (सोने-हरे) अश्व — शत-युज्य (सैकड़ों की संख्या में) — उन्हें समस्त लोकों के चारों ओर ले जाते हैं।
12
तत्सवितुर्वृणीमहे
वयं देवस्य भोजनम्।
श्रेष्ठं सर्वधातमं तुरं भगस्य धीमहि॥
श्रेष्ठं सर्वधातमं तुरं भगस्य धीमहि॥
हम उस दिव्य सवितृ के अन्न-पोषण को वरण करते हैं — जो सर्वश्रेष्ठ, सर्वाधिक पोषणकारी है — हम भग (सवितृ के भाग्य-स्वरूप देवता) की शीघ्र आगमनशील कृपा का ध्यान करते हैं।
13
सविता यन्त्रैः पृथिवीमरम्णात्
आस्कम्भने सवितारं दिविष्टौ।
अश्वमिव अधुक्षद् धुनिमन्तरिक्षम् महाँ अर्णवः।
सविता तद्विवेद॥
अश्वमिव अधुक्षद् धुनिमन्तरिक्षम् महाँ अर्णवः।
सविता तद्विवेद॥
सवितृ ने अपनी यन्त्र-भुजाओं से, आकाशीय क्षेत्र के स्थिर बिन्दु पर, पृथ्वी को थामे रखा। अश्व से दूध की तरह, उन्होंने गतिशील अन्तरिक्ष (आकाश का विशाल समुद्र) को निकाला। सवितृ ही इस (रहस्य) को सच में जानते हैं।