स्तोत्र
आदित्य हृदयम् Āditya Hṛdayam
आदित्य हृदयम् (अर्थात् 'आदित्य का हृदय') सूर्य देव को समर्पित एक अत्यंत प्राचीन और शक्तिशाली वैदिक स्तोत्र है, जो महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण के युद्धकाण्ड (सर्ग १०७) में सम्मिलित है। यह स्तोत्र
1
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥
तब युद्ध से थके हुए, रणभूमि में चिंता में खड़े राम को देखकर, और सामने रावण को युद्ध के लिए तैयार खड़ा देखकर —
2
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपागम्याब्रवीद्रामम् अगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥
उपागम्याब्रवीद्रामम् अगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥
भगवान ऋषि अगस्त्य, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने आए थे, राम के पास जाकर बोले।
3
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥
राम, राम, हे महाबाहु! यह सनातन गुह्य रहस्य सुनो। इससे, हे वत्स, तुम समर में सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करोगे।
4
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम्॥
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम्॥
यह आदित्य हृदयम् पुण्यदायक, सर्व शत्रुओं का विनाशक और विजय प्रदान करने वाला है। इसे नित्य जपना चाहिए — यह अक्षय और परम शिवकारी है।
5
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥
चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥
यह सर्व मंगलों में मंगलमय, सर्व पापों का नाशक है। यह चिंता और शोक को शांत करता है और उत्तम आयुवर्धक है।
6
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥
किरणों से युक्त, उदय होते हुए, देवों और असुरों द्वारा नमस्कृत विवस्वान की — भास्कर, भुवनेश्वर की — पूजा करो।
7
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणान् लोकान् पाति गभस्तिभिः॥
एष देवासुरगणान् लोकान् पाति गभस्तिभिः॥
यह सर्व देवों की आत्मा है, तेजस्वी और अपनी किरणों से पोषण करने वाला। यह अपनी किरणों से देवगणों और असुरगणों सहित सभी लोकों की रक्षा करता है।
8
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥
यह ब्रह्मा भी है, विष्णु भी; शिव, स्कंद और प्रजापति भी। यह महेंद्र, धनद (कुबेर), काल, यम, सोम (चंद्र) और जल के स्वामी भी हैं।
9
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥
यह पितृगण, वसुगण, साध्यगण, अश्विनीकुमार, मरुतगण और मनु हैं। यह वायु, अग्नि, प्रजाओं के प्राण, ऋतुओं के कर्ता और प्रभाकर हैं।
10
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥
यह आदित्य, सविता, सूर्य, खग (आकाश में विचरने वाले), पूषा, गभस्तिमान हैं। यह सुवर्ण के समान, भानु, हिरण्यरेता (हिरण्यगर्भ) और दिवाकर हैं।
11
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्ड अंशुमान्॥
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्ड अंशुमान्॥
हरिद्वर्ण अश्वों वाले, सहस्र किरणों वाले, सात अश्वों वाले, किरणमय। अंधकार का नाश करने वाले, शंभु, त्वष्टा (निर्माता), मार्तण्ड और अंशुमान।
12
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥
हिरण्यगर्भ, शिशिर (शीतल), तपन (तापने वाले), भास्कर, रवि। अग्निगर्भ, अदिति के पुत्र, शंख और शिशिरनाशन।
13
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥
आकाश के नाथ, अंधकार भेदी, ऋग्-यजु:-सामवेद के पारंगत। घनवर्षा के दाता, जल के मित्र और विंध्य पर्वत मार्ग पर विचरने वाले।
14
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः॥
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः॥
आतप देने वाले, मंडल स्वरूप, मृत्यु, पिंगल वर्ण, सर्वतापन। कवि, विश्वरूप, महातेजस्वी, रक्तवर्ण और सर्वभवों के उद्भव।
15
नक्षत्रग्रहताराणाम् अधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥
नक्षत्रों, ग्रहों और तारों के अधिपति, विश्व के पालक। तेजों में भी तेजस्वी, हे द्वादश आत्मा वाले! आपको नमस्कार।
16
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥
पूर्व के पर्वत (उदयाचल) को नमस्कार, पश्चिम के पर्वत (अस्ताचल) को नमस्कार। ज्योतिर्गणों के स्वामी को और दिन के अधिपति को नमस्कार।
17
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥
विजय को, जयमंगल को, हरिद्वर्ण अश्वों वाले को बार-बार नमस्कार। हे सहस्रांशु आदित्य! आपको बार-बार नमस्कार।
18
नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्तण्डाय नमो नमः॥
नमः पद्मप्रबोधाय मार्तण्डाय नमो नमः॥
उग्र को, वीर को, सारंग को बार-बार नमस्कार। कमलों को प्रफुल्लित करने वाले, मार्तण्ड को बार-बार नमस्कार।
19
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥
ब्रह्मा, ईशान (शिव) और अच्युत (विष्णु) के ईश्वर, आदित्यवर्चस सूर्य को। भास्वत, सर्वभक्षक, रौद्र स्वरूप को नमस्कार।
20
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥
तमोनाशक, हिमनाशक, शत्रुनाशक और असीम आत्मा वाले को नमस्कार। कृतघ्नों के नाशक, देव और ज्योतिर्गणों के पति को नमस्कार।
21
तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥
तपे हुए सोने के समान दीप्तिमान, हरि, विश्वकर्मा को नमस्कार। अंधकार के नाशक, प्रकाशमान और लोक साक्षी को नमस्कार।
22
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥
यह प्रभु वास्तव में प्राणियों का नाश करता है और उन्हीं को फिर से सृजित भी करता है। यह पालता है, यह तपाता है और अपनी किरणों से वर्षा कराता है।
23
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥
जब प्राणी सो जाते हैं, यह उन्हीं में स्थित होकर जागता रहता है। यही अग्निहोत्र है और यही अग्निहोत्र करने वालों का फल है।
24
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥
यह वेद है, यह यज्ञ है और यज्ञों का फल भी यही है। लोकों में जितनी भी क्रियाएँ हैं, सबमें यह रवि ही प्रभु है।
25
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव॥
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव॥
हे राघव! आपत्तियों में, कठिनाइयों में, वनों में और भय की स्थितियों में जो कोई इस (सूर्य) का कीर्तन करता है, वह दुखी नहीं होता।
26
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥
एकाग्र होकर देवदेव, जगत्पति की पूजा करो। इसे तीन बार जपकर तुम युद्धों में विजयी होगे।
27
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम च यथागतम्॥
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम च यथागतम्॥
हे महाबाहु! इसी क्षण तुम रावण का वध करोगे। ऐसा कहकर अगस्त्य उसी मार्ग से चले गए जिससे वे आए थे।
28
एतच्छ्रुत्वा महातेजाः नष्टशोकोऽभवत्तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥
यह सुनकर महातेजस्वी राम का शोक उसी क्षण नष्ट हो गया। अत्यन्त प्रसन्न और संयमित मन वाले राघव ने इसे धारण किया।
29
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥
सूर्य की ओर देखकर और इस स्तोत्र का जप करके परम हर्ष प्राप्त किया। तीन बार आचमन कर शुद्ध होकर पराक्रमी राम ने धनुष उठाया।
30
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥
रावण को देखकर प्रसन्नचित्त होकर युद्ध के लिए आगे बढ़े। सम्पूर्ण महाप्रयत्न से उसके वध के लिए दृढ़निश्चयी हो गए।
31
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥
तब सूर्य ने प्रसन्न मन और परम हर्ष के साथ राम को देखकर, निशाचरों के पति (रावण) के विनाश को जानकर, देवगणों के बीच में स्थित होकर कहा — 'शीघ्र करो!'