चालीसा

दुर्गा चालीसा Durgā Cālīsā

दुर्गा चालीसा माँ दुर्गा की भक्ति में रचित चालीस चौपाइयों की अमृत-वाणी है। यह महाशक्ति के अनन्त स्वरूप — महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती — और नवदुर्गा के नौ रूपों की वन्दना करती है। चालीसा में

42 श्लोक · 10 मिनट पाठ · शाक्त
1
जय जगजननी जय दुर्गे माँ करो कृपा विस्तार ।
चालीसा यह भक्त रचे करो भव से उद्धार ॥
जय जगजननी! जय दुर्गे माँ — कृपा विस्तार करो! यह चालीसा भक्त ने रचा है — भव-सागर से उद्धार करो।
2
जय जय दुर्गा देवी माता ।
तेरो यश है जगत में ख्याता ॥
नाम तेरो जो जन नित गावे ।
संकट से वह पार पावे ॥
जय जय दुर्गा देवी माता — तेरा यश जगत् में विख्यात है। जो भक्त नित्य तेरा नाम गाता है, वह संकट से पार हो जाता है।
3
तेरो रूप निराला सोहे ।
तीनों लोक जन मन मोहे ॥
गौर वदन शुभ कमल नयन ।
जग-जननी तुम पाप-क्षयन ॥
तेरा रूप निराला शोभित है — तीनों लोकों के जन मोहित हैं। गौर मुख, शुभ कमल नयन, जगजननी तुम पाप की हर्त्री हो।
4
तेरे हाथ अस्त्र अनेका ।
त्रिशूल खड्ग चक्र विवेका ॥
अष्टभुजा शक्ति की खान ।
महादेवी तू महाप्रधान ॥
तेरे हाथों में अनेक अस्त्र हैं — त्रिशूल, खड्ग और चक्र। अष्टभुजी, शक्ति की खान, महादेवी तू ही महाप्रधान है।
5
सिंह वाहन तेरो शोभित ।
शत्रु देखि मन अति क्षोभित ॥
दुर्गा नाम सुन काँपत पापी ।
तेरो शासन जगत व्यापी ॥
सिंहवाहना शोभायमान है — शत्रु देखकर मन क्षोभित होता है। दुर्गा नाम सुनते ही पापी काँपते हैं — तेरा शासन जगत व्यापी है।
6
त्रिनेत्री तू भवानी माता ।
तेरी दृष्टि भाग्य विधाता ॥
एक दृष्टि से बिगड़े काम ।
दूजी दृष्टि से मिले आराम ॥
त्रिनेत्री भवानी माता — तेरी दृष्टि भाग्य-विधाता है। एक दृष्टि से कार्य बिगड़ते हैं, दूसरी से आराम मिलता है।
7
नव-दुर्गा के नौ स्वरूप ।
सब में तेरे दिव्य अनूप ॥
शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी ।
चन्द्रघण्टा शुभ प्राणधारिणी ॥
नवदुर्गा के नौ स्वरूपों में — तेरे दिव्य और अनुपम रूप विराजते हैं: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा — शुभ प्राणधारिणी।
8
कूष्माण्डा स्कन्दमाता ।
कात्यायनी कालरात्रि माता ॥
महागौरी सिद्धिदात्री ।
नव रूपन की तू विधात्री ॥
कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री — नव रूपों की विधात्री तुम ही हो।
9
देवन ने मिलि तेज समाना ।
एक महाशक्ति अति महाना ॥
सिंह पर चढ़ि असुर संहारे ।
देवन के संकट सब टारे ॥
देवताओं ने अपना संयुक्त तेज एकत्र किया और एक महान् महाशक्ति प्रकट हुई। सिंह पर आरूढ़ होकर उसने असुरों का संहार किया और देवताओं के सारे कष्ट दूर किए।
10
महिषासुर अति दुष्ट अभिमानी ।
त्रिभुवन व्यापी उसकी मनमानी ॥
देवी ने रण माँहि पछारा ।
त्रिशूल मारि उसे संहारा ॥
महिषासुर अत्यंत दुष्ट और अभिमानी था; उसका उपद्रव तीनों लोकों में फैला हुआ था। देवी ने उसे रणभूमि में पटक दिया और त्रिशूल से उसका वध किया।
11
महिषासुर-वध करि माता ।
देवन की मिटी विपत्ति त्राता ॥
सुर-गण तब आनन्द मनाये ।
जय जय जय के नाद उठाये ॥
हे माता, हे त्राता! महिषासुर का वध करके तुमने देवताओं की विपत्ति दूर की। तब देवगण आनंदित हुए और 'जय जय जय' की ध्वनि से दिशाएँ गूँज उठीं।
12
शुम्भ-निशुम्भ दो दानव भारी ।
इन्द्र लोक पर किया अधिकारी ॥
देवन ने फिर तुमको ध्याया ।
कात्यायन आश्रम में आया ॥
शुम्भ और निशुम्भ — दो महाबली राक्षसों ने इन्द्रलोक पर अधिकार जमा लिया। तब देवताओं ने फिर से तुम्हारा ध्यान किया और तुम कात्यायन ऋषि के आश्रम में प्रकट हुईं।
13
धूम्रलोचन चण्ड-मुण्ड आये ।
देवी सम्मुख मरण पाये ॥
चण्डिका रूप धरा माता ।
कटी दोनों की गर्व-त्राता ॥
धूम्रलोचन और फिर चण्ड-मुण्ड सामने आए और देवी के सामने काल के मुँह में समा गए। माता ने चण्डिका का रूप धारण किया और उन दोनों के घमंड को चूर कर दिया।
14
रक्तबीज असुर अति दानी ।
रक्त गिरे उससे बन जानी ॥
काली रूप धरा महाकाली ।
रक्त पिया मुख फैला काली ॥
रक्तबीज राक्षस के पास भयानक वरदान था — उसके रक्त की हर बूँद गिरने पर नया असुर जन्म लेता था। देवी ने महाकाली का रूप धारण किया और अपने विशाल मुख से सारा रक्त पी लिया।
15
शुम्भ मारा रण में माता ।
निशुम्भ भी मुआ जग-त्राता ॥
देव-लोक फिर निर्भय सारे ।
स्वर्गाधिपति बने इन्द्र प्यारे ॥
हे माता, हे जगत-रक्षिका! रण में शुम्भ मारा गया और निशुम्भ भी काल के गाल में चला गया। सारे देवलोक फिर से निर्भय हो गए और प्रिय इन्द्र स्वर्ग के अधिपति बन गए।
16
भक्त पुकारे जब जब माता ।
तुम आई हो बन जग-त्राता ॥
सती उमा पार्वती भवानी ।
तुम ही एक रूप अनुमानी ॥
जब-जब भक्तों ने तुम्हें पुकारा, हे माता, तुम जगत-रक्षिका बनकर आई हो। सती, उमा, पार्वती, भवानी — ये सब तुम्हारे ही एक स्वरूप हैं, जैसा विवेक से जाना जाता है।
17
शैल-पुत्री वृषभ पर आई ।
चन्द्र-मुकुट मस्तक सोहाई ॥
ब्रह्मचारिणी जप-माला धारी ।
तप की देवी जन-हितकारी ॥
शैलपुत्री वृषभ पर सवार होकर आती हैं, उनके मस्तक पर चंद्र-मुकुट शोभित है। ब्रह्मचारिणी जप-माला धारण करती हैं — तप की देवी, जो सब जनों का भला करती हैं।
18
चन्द्रघण्टा घण्टा बजाती ।
असुरन को भय अति दिखाती ॥
कूष्माण्डा अष्टभुजाधारी ।
सूर्य-मण्डल में विहारी ॥
चंद्रघंटा अपनी घंटी बजाती हैं और असुरों को भय दिखाती हैं। कूष्माण्डा अष्टभुजाधारी हैं और सूर्य-मंडल के भीतर विचरण करती हैं।
19
स्कन्दमाता कार्तिक की माता ।
कमल-आसन शोभित भ्राता ॥
कात्यायनी रण-रंग रंगीली ।
शत्रु-दमन में सदा अखेली ॥
स्कंदमाता कार्तिकेय की माँ हैं, उनका कमल-आसन सुशोभित है। कात्यायनी रण के रंग में रंगी हैं — शत्रुओं को वश में करने में सदा अतुलनीय।
20
कालरात्रि घोर रूप धारी ।
काल भी डरे जिसकी भारी ॥
महागौरी श्वेत वस्त्र पहने ।
सिद्धि-दात्री भक्त मन-गहने ॥
कालरात्रि का भीषण रूप ऐसा है कि काल भी उनसे भयभीत होता है। महागौरी श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और सिद्धिदात्री भक्तों के मन की आभूषण हैं।
21
नव-दुर्गा नव-दिन की पूजा ।
नवरात्रि में होती दूजा ॥
जो करे व्रत नियम से माता ।
पाए सुख-धन-मान विधाता ॥
नवरात्रि के नौ दिनों में नव-दुर्गा की पूजा होती है, हर दिन अलग। हे माता, हे विधाता! जो नियमपूर्वक व्रत करता है, उसे सुख, धन और मान की प्राप्ति होती है।
22
दुर्गा सप्तशती जो पढ़े भाई ।
दूर होय विपत्ति सब माई ॥
श्रद्धा-भक्ति से करे पाठ जो ।
पाए मनोवाँछित फल नित हो ॥
हे माई! जो भाई दुर्गा सप्तशती का पाठ करता है, उसकी सभी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं। जो श्रद्धा-भक्ति से पाठ करता है, वह नित्य मनोवाँछित फल पाता है।
23
विन्ध्य-वासिनी विन्ध्य-निवासी ।
काशी में बिराजे काशी-वासी ॥
ज्वाला देवी माँ ज्वाला माँ ।
सती-पीठ पर विराजी रमा ॥
विंध्य-पर्वत पर विंध्यवासिनी के रूप में निवास करती हो, काशी में काशी-वासी के रूप में विराजमान हो। ज्वाला देवी माँ की ज्वाला के रूप में सती-पीठ पर रमा हो।
24
वैष्णो-देवी पर्वत-रानी ।
त्रिकुटा-वासिनी गुण-खानी ॥
कामाख्या कामरूप-विहारी ।
तारा-देवी तारण-हारी ॥
वैष्णो देवी पर्वत-राजकुमारी हैं, त्रिकूटा पर्वत पर निवास करती हैं — गुणों की खान। कामाख्या कामरूप में विचरण करती हैं और तारा देवी भवसागर से पार लगाने वाली हैं।
25
चामुण्डा चण्डी रूप धारी ।
करती पापी-दल संहारी ॥
भैरवी भीम शब्द करती ।
त्रिभुवन-त्रास-दायिनी फिरती ॥
चामुण्डा चण्डी का रूप धारण करके पापियों के दल का संहार करती हैं। भैरवी भयंकर ध्वनि करती हैं और तीनों लोकों में त्रास फैलाते हुए विचरण करती हैं।
26
अन्नपूर्णा अन्न-दात्री माँ ।
भोजन दे सबको दाता माँ ॥
लक्ष्मी धन-सम्पदा की दाती ।
सरस्वती विद्या-ज्ञान जगाती ॥
अन्नपूर्णा हे माँ, अन्न-दात्री हैं — सभी को भोजन देने वाली दाता माँ। लक्ष्मी धन-संपदा प्रदान करती हैं और सरस्वती विद्या व ज्ञान जगाती हैं।
27
तुम ही आदि-शक्ति संसारी ।
तुम ही माया जग-विस्तारी ॥
प्रकृति तुम ही पुरुष के संगे ।
सृष्टि चले तुम्हारे ढंगे ॥
तुम ही संसार की आदि-शक्ति हो; तुम ही जगत को विस्तार देने वाली माया हो। पुरुष के साथ प्रकृति भी तुम ही हो — सृष्टि तुम्हारे ही ढंग से चलती है।
28
ब्रह्मा विष्णु महेश तुम्हारे ।
त्रिगुण-मूल तुम ही प्यारे ॥
सृष्टि पालन संहार सब तेरा ।
जीव-जगत में तेरा डेरा ॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश सब तुम्हारे अधीन हैं; हे प्रिय, तुम ही त्रिगुणों का मूल हो। सृष्टि, पालन और संहार सब तेरा ही है — जीव और जगत में तेरा ही वास है।
29
जो कोई तुमको ध्यान लगाये ।
मनवाँछित सब सुख-फल पाये ॥
बीमार हो तो जल्दी नीका ।
जो दुखिया पाए सुख नीका ॥
जो कोई तुम पर ध्यान लगाता है, उसे मनचाहे सभी सुख-फल मिलते हैं। बीमार जल्दी ठीक हो जाता है और दुखी व्यक्ति सुख पाता है।
30
अन्धे को माँ आँखें देती ।
निर्धन को धन-माला देती ॥
निःसन्तान को पुत्र मिलाती ।
सब की मनोकामना पूरी होती ॥
हे माँ! तुम अंधे को आँखें देती हो और निर्धन को धन-माला प्रदान करती हो। निःसंतान को पुत्र मिलाती हो और सबकी मनोकामना पूरी होती है।
31
जो शरण में तेरी आता ।
उसको कोई दुःख न सताता ॥
दास की लाज रखो माता ।
तुम हो सर्वस्व सुख-दाता ॥
जो तेरी शरण में आता है, उसे कोई दुःख नहीं सताता। हे माता, अपने दास की लाज रखो — तुम ही सर्वस्व और सुख-दाता हो।
32
जय अम्बे जय जगदम्बे माता ।
तेरा यश सब जग में विख्याता ॥
भक्त पुकारें जब-जब माई ।
दौड़ी आई तुमने सहाई ॥
जय अम्बे! जय जगदम्बे माता! तेरा यश सारे जगत में विख्यात है। हे माई! जब-जब भक्तों ने पुकारा, तुम दौड़कर आई और सहारा दिया।
33
शत्रु मारो शत्रु भगाओ ।
भक्त के मन में शान्ति बसाओ ॥
माँगे सो पाएँ तेरे द्वारे ।
कोई न जाए रीते तुम्हारे ॥
शत्रु को मारो, शत्रु को भगाओ और भक्त के मन में शान्ति बसाओ। तेरे दरवाजे पर जो माँगा, वह मिलता है — तेरे यहाँ से कोई रीता नहीं जाता।
34
रोग-शोक दूर कर माई ।
माता तेरी बड़ी कमाई ॥
संकट-हरणी सुख-दायिनी ।
भव-सागर की नौका-नायिनी ॥
हे माई! रोग और शोक दूर करो — माता, तेरी कमाई बड़ी है। तुम संकट हरने वाली, सुख देने वाली और भव-सागर की नौका-नायिका हो।
35
पाप-ताप सब दूर भगाओ ।
मुक्ति-पद हमको दिलाओ ॥
जनम-मरण के फेर मिटाओ ।
निज-चरणों की भक्ति बताओ ॥
सब पाप और ताप दूर भगाओ, हमें मुक्ति-पद दिलाओ। जन्म-मरण के चक्कर मिटाओ और अपने चरणों की भक्ति हमें दिखाओ।
36
जो यह चालीसा पढ़े नित माता ।
सो पाए मनचाहा फल विधाता ॥
श्रद्धा-भक्ति से जो गाये ।
देवी कृपा उस पर बरसाये ॥
हे माता, हे विधाता! जो नित्य यह चालीसा पढ़ता है, उसे मनचाहा फल मिलता है। जो श्रद्धा-भक्ति से गाता है, उस पर देवी कृपा बरसाती हैं।
37
मंगल-वार शुक्रवार को माता ।
पाठ करे जो सुख का दाता ॥
विघ्न-बाधा सब दूर हो जावे ।
घर में सुख-शान्ति-धन आवे ॥
हे माता! मंगलवार और शुक्रवार को जो पाठ करता है, वह सुख का भागी होता है। सब विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं और घर में सुख, शान्ति और धन का आगमन होता है।
38
नवरात्रि में पाठ करे जो भाई ।
पाए अपने मन की मनचाही ॥
दुर्गा-पूजा में गाएँ सब लोग ।
दूर हो जाएँ जग के सब रोग ॥
नवरात्रि में जो भाई पाठ करता है, वह अपने मन की मनचाही बात पाता है। दुर्गा-पूजा में सब लोग गाएँ तो जगत के सब रोग दूर हो जाएँ।
39
जो सेवक माता का दासा ।
पूरी करती उसकी आसा ॥
भक्त अटल विश्वास रखे जो ।
माँ के प्यारे बन जाते वो ॥
जो सेवक माता का दास बनता है, माता उसकी हर आशा पूरी करती है। जो भक्त अटल विश्वास रखता है, वह माँ का प्यारा बन जाता है।
40
दुर्गा माँ की महिमा न्यारी ।
जग में सबसे ऊँची भारी ॥
गाएँ ध्यावें करें सब पूजा ।
दूजा कोई देव नहीं दूजा ॥
दुर्गा माँ की महिमा अनोखी है — जगत में सबसे ऊँची और महान। सब उनका गान करें, ध्यान करें और पूजा करें — उनसे बढ़कर दूसरा कोई देव नहीं है।
41
सुमिरन करे जो नित उठ माता ।
चालीसा का दोहराए दाता ॥
भवन में माँ की जोत जलाएँ ।
जन्म-जन्म का तम मिट जाएँ ॥
हे माता, हे दाता! जो नित उठकर सुमिरन करे और चालीसा का पाठ दोहराए; जो घर में माँ की ज्योत जलाए — उसके जन्म-जन्म का अंधेरा मिट जाए।
42
दुर्गा माँ की चालीसा, गावें भक्त सुजान ।
सब विपत्ति से रक्षा करें, माता हमारी जान ॥
दुर्गा माँ की चालीसा को सुजान भक्त गाएँ। माता सभी विपत्तियों से हमारी रक्षा करें — वे हमारी जान हैं।