चालीसा
राम चालीसा Rāma Cālīsā
राम चालीसा भारतीय भक्ति परम्परा की एक अत्यन्त प्रिय रचना है, जो प्रभु श्री राम — विष्णु के सप्तम अवतार — की महिमा का गुणगान करती है। चालीस चौपाइयाँ और दो दोहे मिलकर राम के जन्म से रामराज्य की स्थापना
1
जय रघुनन्दन जय सियापति जय जग के आधार ।
कृपासिन्धु रघुवंशमणि दो भव से उद्धार ॥
कृपासिन्धु रघुवंशमणि दो भव से उद्धार ॥
जय रघुनन्दन! जय सीतापति! जय जगत् के आधार! हे कृपासागर रघुवंशमणि, हमें इस भव-सागर से पार उतारिए।
2
जय श्री राम जय राम रघुराई ।
जगत-पालन कर दुख मिटाई ॥
राम नाम अरु नाम रसाना ।
सकल सुखन का है निदाना ॥
जगत-पालन कर दुख मिटाई ॥
राम नाम अरु नाम रसाना ।
सकल सुखन का है निदाना ॥
जय श्री राम! जगत् का पालन करने वाले, दुःख मिटाने वाले रघुराई को जय हो। राम-नाम और उस नाम का रस ही समस्त सुखों का मूल है।
3
दशरथ नन्दन रघुकुल भूषन ।
कौशल्या के प्राण पोषन ॥
अवध नगर में जन्म लियो जब ।
तीनों लोक हरषित हुए तब ॥
कौशल्या के प्राण पोषन ॥
अवध नगर में जन्म लियो जब ।
तीनों लोक हरषित हुए तब ॥
दशरथ के नन्दन, रघुकुल के भूषण, कौशल्या के प्राणपोषक — जब वे अवध नगर में जन्मे, तब तीनों लोक हर्षित हो उठे।
4
श्याम वदन सरसीज नयन ।
मेघ-वर्ण मन-मोहन-गयन ॥
बाल-रूप की छवि अति प्यारी ।
नाथ करो हम पर जग-दुलारी ॥
मेघ-वर्ण मन-मोहन-गयन ॥
बाल-रूप की छवि अति प्यारी ।
नाथ करो हम पर जग-दुलारी ॥
श्यामल वर्ण, कमल-नयन, मेघ के समान मन-मोहन रूप — बाल-अवस्था की छवि अत्यन्त प्यारी थी। नाथ, हम पर इसी जग-दुलारी छवि की कृपा करें।
5
राम नाम जग महिमा भारी ।
शिव सदा जपत रहत मुरारी ॥
जो नर जपत राम को नामा ।
पावत जीव परम बिश्रामा ॥
शिव सदा जपत रहत मुरारी ॥
जो नर जपत राम को नामा ।
पावत जीव परम बिश्रामा ॥
राम-नाम की जग में महिमा अपार है — शिव सदा जपते हैं, मुरारी भी जपते हैं। जो नर राम-नाम जपता है, उसे परम विश्राम मिलता है।
6
विश्वामित्र लिए वन धाए ।
यज्ञ राखन को पहुँचे जाए ॥
ताड़का असुरी मार गिराई ।
सुबाहु मारीच को दिया दुख भाई ॥
यज्ञ राखन को पहुँचे जाए ॥
ताड़का असुरी मार गिराई ।
सुबाहु मारीच को दिया दुख भाई ॥
ऋषि विश्वामित्र की पुकार पर राम वन को धाए — यज्ञ की रक्षा के लिए पहुँचे। ताड़का राक्षसी को मार गिराया और सुबाहु-मारीच को दुख दिया।
7
जनकपुरी में पहुँचे रामा ।
धनुष तोड़ सीता पाई वामा ॥
विवाह मंगल सबने गाया ।
राम-जानकी जोड़ा आया ॥
धनुष तोड़ सीता पाई वामा ॥
विवाह मंगल सबने गाया ।
राम-जानकी जोड़ा आया ॥
राम जनकपुरी पहुँचे और धनुष तोड़कर सीता को वरा। सबने विवाह का मंगलगान गाया — राम-जानकी का पवित्र जोड़ा मिल गया।
8
सीता जग में जनक-दुलारी ।
पतिव्रता की परम उजयारी ॥
राम सँग वन-वन ठौर डुलायो ।
पति-धर्म को सच्चा निभायो ॥
पतिव्रता की परम उजयारी ॥
राम सँग वन-वन ठौर डुलायो ।
पति-धर्म को सच्चा निभायो ॥
सीता जग में जनक की दुलारी और पतिव्रता की परम ज्योति हैं। उन्होंने राम के साथ वन-वन भटककर पति-धर्म को सच्चे मन से निभाया।
9
कैकेई के वरदान से भारी ।
राम को वन की आज्ञा भारी ॥
पिता वचन मान लियो शिर धारी ।
धर्म मार्ग को रखा जारी ॥
राम को वन की आज्ञा भारी ॥
पिता वचन मान लियो शिर धारी ।
धर्म मार्ग को रखा जारी ॥
कैकेई के वरदान के बोझ से राम को वन-वास का आदेश मिला। उन्होंने पिता का वचन माथे पर धारण कर धर्म-मार्ग को जारी रखा।
10
अवध छोड़ वन को चल दीने ।
सँग लखन सिया मन मेले हीने ॥
नगर जन रोय रोय पछितावे ।
राम बिना जग सूना भावे ॥
सँग लखन सिया मन मेले हीने ॥
नगर जन रोय रोय पछितावे ।
राम बिना जग सूना भावे ॥
राम अवध छोड़कर लखन और सीता के साथ वन को चल दिए — मन शान्त किए। नगर के लोग बिलख-बिलखकर रोए — राम बिना जग सूना लगा।
11
गंगा तट पर आए रघुराई ।
निषाद-राज ने सेवा पाई ॥
नाव चढ़ गंगा पार किए पग ।
चल दिए आगे बिना लाग-बाग ॥
निषाद-राज ने सेवा पाई ॥
नाव चढ़ गंगा पार किए पग ।
चल दिए आगे बिना लाग-बाग ॥
रघुराई गंगा तट पर आए — निषाद-राज ने भक्तिपूर्वक सेवा की। नाव पर चढ़कर गंगा पार की और बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ गए।
12
चित्रकूट पर डेरा डाला ।
वन में रहे आनन्द निराला ॥
भरत भाई आए पद धोने ।
राम चरण में रोए रोए ॥
वन में रहे आनन्द निराला ॥
भरत भाई आए पद धोने ।
राम चरण में रोए रोए ॥
चित्रकूट पर उन्होंने डेरा डाला — वन में अनोखे आनन्द के साथ रहे। भरत भाई चरण धोने आए और राम के चरणों में रो-रोकर विलाप किया।
13
भरत चरण लखि पादुका लीन्हीं ।
नन्दीग्राम वास की रीत दीन्हीं ॥
भ्रातृ-भक्ति की अदभुत रचाई ।
राम-वियोग दशा अकुलाई ॥
नन्दीग्राम वास की रीत दीन्हीं ॥
भ्रातृ-भक्ति की अदभुत रचाई ।
राम-वियोग दशा अकुलाई ॥
भरत ने राम के चरण-पादुका लेकर नन्दीग्राम में वास किया — राज्य-धर्म का यह अनोखा ढंग था। राम-वियोग में उनकी यह भ्रातृ-भक्ति अदभुत रही।
14
दण्डक वन में मुनि-आश्रम आए ।
ऋषियों के दुःख दूर कराए ॥
अगस्त्य मुनि से आशीष लीन्हो ।
दिव्य धनुष-बाण हाथ दीन्हो ॥
ऋषियों के दुःख दूर कराए ॥
अगस्त्य मुनि से आशीष लीन्हो ।
दिव्य धनुष-बाण हाथ दीन्हो ॥
दण्डक वन में मुनियों के आश्रम आए, ऋषियों के दुःख दूर किए। अगस्त्य मुनि का आशीर्वाद लिया और उनसे दिव्य धनुष-बाण प्राप्त किया।
15
शूर्पणखा दुर्मति मदमाती ।
लखन ने दण्ड दियो बड़ भारी ॥
रावण सुनि क्रोधित अति भाई ।
मारीच को भेजा छलकाई ॥
लखन ने दण्ड दियो बड़ भारी ॥
रावण सुनि क्रोधित अति भाई ।
मारीच को भेजा छलकाई ॥
दुर्बुद्धि और मदमाती शूर्पणखा भेष बनाकर आई — लखन ने उसे भारी दण्ड दिया। रावण यह सुनकर क्रोधित हुआ और छल करने के लिए मारीच को भेजा।
16
मारीच माया-मृग बना आया ।
राम धनुष ले पीछे धाया ॥
रावण ने साधुवेश धरि छल से ।
जानकी हरीं गिद्ध जटायु से ॥
राम धनुष ले पीछे धाया ॥
रावण ने साधुवेश धरि छल से ।
जानकी हरीं गिद्ध जटायु से ॥
मारीच माया-मृग बनकर आया — राम धनुष लेकर उसके पीछे दौड़े। रावण ने साधु का वेश धरकर छल से जानकी को हर लिया — गिद्धराज जटायु ने रोकने की कोशिश की।
17
जटायु ने रावण से लड़ाई ।
प्राण-बलि दे राम-सेवा कराई ॥
राम ने पितृवत् उद्धार दिया ।
पक्षिराज की मुक्ति किया ॥
प्राण-बलि दे राम-सेवा कराई ॥
राम ने पितृवत् उद्धार दिया ।
पक्षिराज की मुक्ति किया ॥
जटायु ने रावण से युद्ध किया और राम-सेवा में प्राण-बलि दी। राम ने उन्हें पिता के समान मानकर मुक्ति दी — पक्षिराज जटायु का यश सर्वत्र गाया जाता है।
18
शबरी के बेर हाथों खाए ।
भक्ति-प्रेम को परखते आए ॥
ऊँच-नीच का भेद मिटाया ।
निष्काम भक्ति का पाठ सिखाया ॥
भक्ति-प्रेम को परखते आए ॥
ऊँच-नीच का भेद मिटाया ।
निष्काम भक्ति का पाठ सिखाया ॥
राम ने शबरी के हाथों से बेर खाए — प्रेम और भक्ति की परख के लिए आए। ऊँच-नीच का भेद मिटाया — निष्काम भक्ति का पाठ पढ़ाया।
19
ऋष्यमूक पर राम सिधाए ।
हनुमत-जी से मेल मिलाए ॥
भक्त-भगवान सुखद मिलना ।
राम-कार्य आगे चल चलना ॥
हनुमत-जी से मेल मिलाए ॥
भक्त-भगवान सुखद मिलना ।
राम-कार्य आगे चल चलना ॥
ऋष्यमूक पर्वत पर राम पहुँचे और हनुमान जी से भेंट हुई। भक्त-भगवान का यह सुखद मिलन था — राम-कार्य का मार्ग आगे खुला।
20
बाली-वध किया राम रघुराई ।
सुग्रीव को राजगद्दी दिलाई ॥
वानर-सेना जुटाई भारी ।
सीता खोज को चले पहारी ॥
सुग्रीव को राजगद्दी दिलाई ॥
वानर-सेना जुटाई भारी ।
सीता खोज को चले पहारी ॥
राम रघुराई ने बाली का वध किया और सुग्रीव को राजगद्दी दिलाई। भारी वानर-सेना को जुटाकर पहाड़ों में सीता की खोज पर रवाना किया।
21
हनुमान लंका को धाए ।
जानकी माँ का पता पाए ॥
राम-अंगूठी दिखाई तब वहाँ ।
सीता को धीर मिला तहाँ ॥
जानकी माँ का पता पाए ॥
राम-अंगूठी दिखाई तब वहाँ ।
सीता को धीर मिला तहाँ ॥
हनुमान लंका को दौड़े और जानकी माँ का पता लगाया। राम की अँगूठी दिखाकर सीता को वहाँ धीर बँधाया।
22
लंका दहन हनुमान किया ।
राक्षस-दल को भय दिया ॥
राम-काज का फल भया ।
सुखद समाचार लेकर आया ॥
राक्षस-दल को भय दिया ॥
राम-काज का फल भया ।
सुखद समाचार लेकर आया ॥
हनुमान ने लंका को जलाया और राक्षस-दल में भय फैलाया। राम-काज पूरा करके, सुखद समाचार लेकर लौट आए।
23
सेतु-बन्धन का कार्य किया ।
नल-नील ने पाहन तरिया ॥
सागर पार कर राम धाए ।
लंका-युद्ध को चले आए ॥
नल-नील ने पाहन तरिया ॥
सागर पार कर राम धाए ।
लंका-युद्ध को चले आए ॥
सेतु-बन्धन का महाकार्य किया — नल-नील ने पत्थर समुद्र में तराए। सागर पार करके राम अपनी सेना के साथ लंका-युद्ध को चल दिए।
24
कुम्भकर्ण अरु मेघनाद मारे ।
राक्षस-सेना के हाथ-पाँव हारे ॥
एक-एक वीर रण में काटे ।
रावण के सब सेनापति छाँटे ॥
राक्षस-सेना के हाथ-पाँव हारे ॥
एक-एक वीर रण में काटे ।
रावण के सब सेनापति छाँटे ॥
कुम्भकर्ण और मेघनाद को मार गिराया — राक्षस-सेना एक-एक करके हारती गई। रावण के सभी सेनापति रण में काटे गए।
25
दशकन्धर को बाण लगाए ।
रावण-दल को धूल चटाए ॥
धर्म की जय और अधर्म के हारे ।
राम-विजय की जय जयकारे ॥
रावण-दल को धूल चटाए ॥
धर्म की जय और अधर्म के हारे ।
राम-विजय की जय जयकारे ॥
राम ने दशकन्धर रावण पर बाण चलाए और उसके दल को धूल चटाई। धर्म की जय हुई, अधर्म हारा — राम-विजय की जय-जयकार गूँज उठी।
26
सीता माँ को मुक्त कराया ।
पुष्पक विमान में साथ लाया ॥
विभीषण को लंका का राजा ।
राम-कृपा से मिटा सब काजा ॥
पुष्पक विमान में साथ लाया ॥
विभीषण को लंका का राजा ।
राम-कृपा से मिटा सब काजा ॥
सीता माँ को मुक्त कराकर पुष्पक विमान में साथ लाए। विभीषण को लंका का राजा बनाया — राम-कृपा से सब काज सिद्ध हुए।
27
अयोध्या में राम पधारे ।
दीप जलाए लोक सवारे ॥
राज-तिलक की शोभा छाई ।
जय जय राम की ध्वनि जाई ॥
दीप जलाए लोक सवारे ॥
राज-तिलक की शोभा छाई ।
जय जय राम की ध्वनि जाई ॥
राम अयोध्या में पधारे — लोगों ने दीप जलाए और नगर सजाया। राज-तिलक की शोभा छाई — चहुँ ओर जय-जय राम की ध्वनि गूँजी।
28
रामराज में सुख समाया ।
प्रजा का दुःख सब बिसराया ॥
न कोई भूखा न कोई प्यासा ।
सबके मन में राम का वासा ॥
प्रजा का दुःख सब बिसराया ॥
न कोई भूखा न कोई प्यासा ।
सबके मन में राम का वासा ॥
रामराज में सर्वत्र सुख छा गया — प्रजा का सारा दुःख भुला दिया गया। न कोई भूखा था, न कोई प्यासा — सबके मन में राम का वासा था।
29
राम गुण का कोई अन्त नाही ।
वेद पुराण जपत हैं माही ॥
जो जो राम के गुण गाए ।
भव-बन्धन से मुक्त हो जाए ॥
वेद पुराण जपत हैं माही ॥
जो जो राम के गुण गाए ।
भव-बन्धन से मुक्त हो जाए ॥
राम के गुणों का कोई अन्त नहीं — वेद और पुराण सदा उनकी महिमा गाते हैं। जो जो राम के गुण गाता है, वह भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
30
राम भगवान रूप मनोहर ।
मन मोहत बिन आडम्बर ॥
शरणागत के काज सँवारे ।
दुःख हरत भव-भय से तारे ॥
मन मोहत बिन आडम्बर ॥
शरणागत के काज सँवारे ।
दुःख हरत भव-भय से तारे ॥
राम भगवान का रूप मनोहर है — बिना किसी आडम्बर के मन को मोहते हैं। शरणागत के काज सँवारते हैं — दुःख हरते हैं और भव-भय से तारते हैं।
31
संकट में राम को जो पुकारे ।
भक्त के दुख तुरत निवारे ॥
राम-नाम का जप जो करई ।
सब बाधाएँ झट दूर हरई ॥
भक्त के दुख तुरत निवारे ॥
राम-नाम का जप जो करई ।
सब बाधाएँ झट दूर हरई ॥
जो संकट में राम को पुकारे — राम उसके दुःख तुरन्त दूर करें। जो राम-नाम का जप करे — उसकी सब बाधाएँ तुरन्त हट जाएँ।
32
हनुमान राम के प्रिय सेवक ।
दोनों की जोड़ी जगत में अनेक ॥
हनुमत की भक्ति राम को भाई ।
राम-भक्ति से परम सिद्धि पाई ॥
दोनों की जोड़ी जगत में अनेक ॥
हनुमत की भक्ति राम को भाई ।
राम-भक्ति से परम सिद्धि पाई ॥
हनुमान राम के सबसे प्रिय सेवक हैं — इन दोनों की जोड़ी जगत् में अनोखी और प्रसिद्ध है। हनुमान की भक्ति राम को प्रिय लगी — राम-भक्ति से परम सिद्धि मिलती है।
33
राम करुणा के सागर भारी ।
दीन-दुखी के हैं हितकारी ॥
जो शरण में आकर सीस नवाएँ ।
राम उन्हें निश्चित उठाएँ ॥
दीन-दुखी के हैं हितकारी ॥
जो शरण में आकर सीस नवाएँ ।
राम उन्हें निश्चित उठाएँ ॥
राम करुणा के महासागर हैं — दीन-दुखी के परम हितकारी हैं। जो शरण में आकर सीस नवाते हैं — राम निश्चित रूप से उन्हें उठाते हैं।
34
छोटे-बड़े का भेद न राखे ।
शबरी केवट सबको देखे ॥
भक्त-वत्सल अरु प्रजा-पालक ।
ऐसे हैं राम जग-पालक ॥
शबरी केवट सबको देखे ॥
भक्त-वत्सल अरु प्रजा-पालक ।
ऐसे हैं राम जग-पालक ॥
राम छोटे-बड़े का भेद नहीं रखते — शबरी और केवट को समान दृष्टि से देखते हैं। वे भक्त-वत्सल और प्रजा-पालक हैं — ऐसे हैं राम जग-पालक।
35
राम-भक्ति में मन लगाओ ।
जन्म-जन्म के पाप मिटाओ ॥
नाम जप से मोक्ष मिलाई ।
परम शान्ति पावे मतवाई ॥
जन्म-जन्म के पाप मिटाओ ॥
नाम जप से मोक्ष मिलाई ।
परम शान्ति पावे मतवाई ॥
राम-भक्ति में मन लगाओ और जन्म-जन्म के पाप मिटाओ। नाम-जप से मोक्ष मिलता है — मतवाले को परम शान्ति प्राप्त होती है।
36
राम-नाम औषधि सब रोगन ।
पाप-त्रय का करत निर्मोगन ॥
जो नर नित राम-नाम जपावे ।
काल-व्याल से मुक्त हो जावे ॥
पाप-त्रय का करत निर्मोगन ॥
जो नर नित राम-नाम जपावे ।
काल-व्याल से मुक्त हो जावे ॥
राम-नाम समस्त रोगों की औषधि है — त्रिविध पाप का निर्मोचन करती है। जो नर नित्य राम-नाम जपता है, वह काल-रूपी सर्प से मुक्त हो जाता है।
37
ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों ।
राम-महिमा जपत अधीनों ॥
शेषनाग जपते राम-नामा ।
सबका आधार श्रीराम धामा ॥
राम-महिमा जपत अधीनों ॥
शेषनाग जपते राम-नामा ।
सबका आधार श्रीराम धामा ॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही — राम-महिमा को अधीनता से जपते हैं। शेषनाग भी राम-नाम जपते हैं — श्री राम का धाम ही सबका आधार है।
38
हे रघुपति मोरी सुनो अरजाई ।
भवसागर से पार लगाई ॥
चरण-कमल में शरण दिजो ।
निज भक्ति का दान दिजो ॥
भवसागर से पार लगाई ॥
चरण-कमल में शरण दिजो ।
निज भक्ति का दान दिजो ॥
हे रघुपति, मेरी अर्जी सुनो — भव-सागर से पार लगाओ। अपने चरण-कमल में शरण दो — अपनी भक्ति का दान दो।
39
जन्म-मरण के फेर छुड़ाओ ।
मन वचन कर्म से राम मिलाओ ॥
मोह-ममता की गाँठ खुलाओ ।
परम-पद की राह सुझाओ ॥
मन वचन कर्म से राम मिलाओ ॥
मोह-ममता की गाँठ खुलाओ ।
परम-पद की राह सुझाओ ॥
जन्म-मरण के चक्र से छुड़ाओ — मन, वचन, कर्म से राम से मिलाओ। मोह-ममता की गाँठ खोलो — परम-पद की राह दिखाओ।
40
यह चालीसा भक्त ने गाया ।
राम-चरण में मन को लगाया ॥
जो जन ध्यान धरे यह पड़हीं ।
राम-कृपा नित्य उन पर रहीं ॥
राम-चरण में मन को लगाया ॥
जो जन ध्यान धरे यह पड़हीं ।
राम-कृपा नित्य उन पर रहीं ॥
यह चालीसा एक भक्त ने गाया — राम-चरण में मन लगाकर। जो जन ध्यानपूर्वक इसका पाठ करे — उस पर राम-कृपा नित्य बनी रहे।
41
नित नेम उठि राम को ध्यावे ।
हृदय-कमल में राम समावे ॥
जो यह पाठ करे मन लाई ।
राम-कृपा पल में फलि जाई ॥
हृदय-कमल में राम समावे ॥
जो यह पाठ करे मन लाई ।
राम-कृपा पल में फलि जाई ॥
नित्य नियम से उठकर राम का ध्यान करो — हृदय-कमल में राम को समाने दो। जो मन लगाकर यह पाठ करे — राम-कृपा उनके लिए पल में फलती है।
42
राम चालीसा जो पढ़े प्रतिदिन प्रेम लगाय ।
राम-कृपा का पात्र बन निश्चय परम पद पाय ॥
राम-कृपा का पात्र बन निश्चय परम पद पाय ॥
जो नर राम चालीसा को प्रतिदिन प्रेमपूर्वक पढ़ता है, वह राम-कृपा का पात्र बनकर निश्चय ही परम पद पाता है।