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स्तोत्र

राम रक्षा स्तोत्रम् Rāma Rakṣā Stotram

राम रक्षा स्तोत्र वैष्णव परंपरा की एक अत्यंत श्रद्धेय कवच-प्रार्थना है। बुधकौशिक ऋषि को भगवान शिव ने स्वप्न में यह स्तोत्र प्रदान किया — ऐसी मान्यता है। यह स्कंद पुराण में उद्धृत है और उत्तर भारत तथा

38 श्लोक · 12 मिनट पाठ · वैष्णव
1
ध्यायेद् आजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ।
वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥
रामचंद्र का ध्यान करें: आजानुबाहु, शर-धनुष धारण किए, बद्ध-पद्मासन पर विराजमान; पीत वस्त्र पहने हुए, नए कमल की पंखुड़ियों से होड़ करती आँखें, मुखमंडल प्रसन्न। बाईं ओर सीता का कमल-मुख उनकी आँखों से मिलता है; देह में नीरद-सी आभा, विविध आभूषणों से दीप्त, विशाल जटा-मंडल धारण किए हुए।
2
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥
रघुनाथ का चरित्र सैकड़ों करोड़ श्लोकों में विस्तृत है। इसका एक-एक अक्षर मनुष्यों के महापापों का नाश करने वाला है।
3
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥
नीले कमल के समान श्यामवर्ण, कमल-नयन, जानकी और लक्ष्मण से युक्त, जटा-मुकुट से मण्डित राम का ध्यान करके —
4
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥
— तरकश, धनुष और बाण हाथ में लिए, निशाचरों के अंतक; जो अपनी लीला से जगत की रक्षा के लिए प्रकट हुए, वे अज और विभु —
5
रामरक्षां पठेत् प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥
बुद्धिमान मनुष्य पाप-नाशिनी और सर्व-कामना-पूर्ण करने वाली इस राम-रक्षा का पाठ करे। राघव मेरे सिर की रक्षा करें; दशरथ-पुत्र मेरे मस्तक की रक्षा करें।
6
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥
कौशल्यानन्दन मेरी दोनों आँखों की रक्षा करें; विश्वामित्र-प्रिय मेरे कानों की। यज्ञ-रक्षक मेरी नाक की रक्षा करें; सौमित्र-वत्सल मेरे मुख की।
7
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥
विद्यानिधि मेरी जिह्वा की रक्षा करें; भरत द्वारा वंदित मेरे कण्ठ की। दिव्यायुध-धारी मेरे कंधों की रक्षा करें; शिव-धनुष-भंजन करने वाले मेरी भुजाओं की।
8
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥
सीता-पति मेरे हाथों की रक्षा करें; परशुराम-जय करने वाले मेरे हृदय की। खर-ध्वंसी मेरी कमर की रक्षा करें; जाम्बवान के आश्रय मेरी नाभि की।
9
सुग्रीवेशः कटिं पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
जानुनी सेतुकृत् पातु जङ्घे दशमुखान्तकः ॥
सुग्रीव के स्वामी मेरी कमर की रक्षा करें; हनुमान के प्रभु मेरी जाँघों की। सेतु-निर्माता मेरे घुटनों की रक्षा करें; दशानन-अंतक मेरी पिंडलियों की।
10
गुल्फौ विभीषणश्रीदः पादौ लक्ष्मणपूर्वजः ।
अहोरात्रावशेषाङ्गान् पातु रामोऽखिलेश्वरः ॥
विभीषण को श्री देने वाले मेरे टखनों की रक्षा करें; लक्ष्मण के अग्रज मेरे पैरों की। रामचंद्र सर्वेश्वर दिन-रात के शेष समस्त अंगों की रक्षा करें।
11
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥
जो पुण्यात्मा इस राम-बलसम्पन्न रक्षा-स्तोत्र का पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील होता है।
12
पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥
पाताल, भूतल और आकाश में विचरने वाले, छद्म वेश धारण करने वाले प्राणी भी राम-नाम से रक्षित व्यक्ति को देख तक नहीं सकते।
13
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥
'राम', 'रामभद्र' या 'रामचंद्र' — इनमें से किसी नाम का स्मरण करने वाला मनुष्य पापों से मुक्त रहता है और भुक्ति तथा मुक्ति दोनों को प्राप्त करता है।
14
जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥
जगत को जीतने वाले एकमात्र मंत्र राम-नाम से रक्षित होकर जो व्यक्ति इसे कण्ठ में धारण करता है, उसकी मुट्ठी में सभी सिद्धियाँ होती हैं।
15
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम् ॥
'वज्र-पंजर' नामक इस राम-कवच का जो स्मरण करता है, उसकी आज्ञा सर्वत्र अप्रतिहत रहती है और वह जय व मंगल प्राप्त करता है।
16
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥
जैसे स्वप्न में भगवान शिव ने इस राम-रक्षा का उपदेश दिया, वैसे ही प्रातःकाल जागने पर बुधकौशिक ऋषि ने इसे लिख लिया।
17
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः ॥
वे समस्त कल्पवृक्षों के उद्यान हैं, समस्त आपदाओं का अंत हैं, तीनों लोकों के आनंद हैं — वे श्रीमान् राम ही हमारे प्रभु हैं।
18
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥
दोनों (राम और लक्ष्मण) युवा, रूपवान, सुकुमार और महाबली हैं — कमल के समान विशाल नेत्रों वाले, वल्कल और कृष्णमृग-चर्म के वस्त्र पहने।
19
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥
फल और मूल खाने वाले, जितेन्द्रिय, तपस्वी, ब्रह्मचारी — दशरथ के ये दो पुत्र, राम और लक्ष्मण, दोनों भाई हैं।
20
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥
समस्त प्राणियों के आश्रय, समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ, राक्षस-कुल का संहार करने वाले — ये दोनों रघुकुल-श्रेष्ठ हमारी रक्षा करें।
21
आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥
धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ाए, प्रत्यञ्चा पर उँगली रखे, पार्श्व में तूणीर लगाए — मेरी रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण सदा मेरे आगे-आगे चलते रहें।
22
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन् मनोरथान्नश्यन् रामः पातु स लक्ष्मणः ॥
कवच पहने, तलवार लिए, धनुष-बाण सहित, युवा, आगे बढ़ते हुए, मनोरथों की बाधाओं को नष्ट करते हुए — वे राम और लक्ष्मण हमारी रक्षा करें।
23
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥
राम दशरथ-पुत्र हैं, शूर हैं, लक्ष्मण के साथ हैं, बलवान हैं; काकुत्स्थ-वंशी हैं, पूर्ण पुरुष हैं, कौशल्या-पुत्र हैं, रघुकुल-श्रेष्ठ हैं —
24
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमान् अप्रमेयपराक्रमः ॥
वेदांत से जाने जाने वाले, यज्ञ के अधिपति, पुराणों के पुरुषोत्तम — जानकी-वल्लभ, श्रीमान्, अप्रमेय-पराक्रमी।
25
हरिर्मर्त्यः प्रभुः साक्षात् सर्वेषां भाग्यसम्भवः ।
रामो राजीवनयनः सर्वेषां शरणाश्रयः ॥
हरि स्वयं मनुष्य रूप में प्रकट हुए — सबके प्रत्यक्ष प्रभु, सबके भाग्य के उद्गम। कमल-नयन राम ही सबके शरण और आश्रय हैं।
26
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥
आपदाओं का हरण करने वाले, सम्पूर्ण सम्पदाओं के दाता, लोकों के आनंद — श्री राम को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।
27
भर्जनं भवबीजानाम् अर्जनं सुखसम्पदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां राम रामेति गर्जनम् ॥
'राम! राम!' का उद्घोष — संसार के बीजों को भस्म करने वाला, सुख-संपदा का अर्जन करने वाला, यम के दूतों को ललकारने वाला।
28
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥
मन के समान वेग वाले, वायु के समान गति वाले, जितेन्द्रिय, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ — वायुपुत्र, वानर-यूथ के प्रमुख, श्रीराम के दूत की मैं शरण लेता हूँ।
29
कूजन्तं राम रामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥
'राम राम' की मधुर, मधुर-अक्षर-युक्त कूजन करते हुए, काव्य-शाखा पर विराजमान — कविता-कोकिल वाल्मीकि को मैं नमस्कार करता हूँ।
30
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
ग्रहनक्षत्रशान्त्यर्थं रामं प्रणमाम्यहम् ॥
आपदाओं का हरण करने वाले, सम्पूर्ण सम्पदाओं के दाता — ग्रह और नक्षत्रों की शांति के लिए मैं राम को प्रणाम करता हूँ।
31
सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषां मङ्गलम् ।
येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनो हरिः ॥
जिनके हृदय में मंगल के आवास भगवान् हरि विराजमान हैं, उनके सभी कार्यों में सदा मंगल ही मंगल है।
32
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव ।
विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि ॥
वही लग्न शुभ है, वही दिन सुदिन है — उसी क्षण तारा-बल और चंद्र-बल होता है, विद्या-बल और दैव-बल होता है — हे लक्ष्मीपते! आपके चरण-युगल का मैं स्मरण करता हूँ।
33
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥
दूर्वा-दल के समान श्याम, कमल-नयन, पीतवस्त्रधारी राम की जो दिव्य नामों से स्तुति करते हैं, वे संसार-चक्र में नहीं पड़ते।
34
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥
लक्ष्मण के अग्रज, रघुकुल-श्रेष्ठ, सीता-पति, सुंदर; काकुत्स्थ-वंशी, करुणा के समुद्र, गुणों के भंडार, ब्राह्मण-प्रिय, धर्मनिष्ठ; राजेन्द्र, सत्य-प्रतिज्ञ, दशरथ-पुत्र, श्यामल, शान्त-मूर्ति — लोकाभिराम, रघुकुल-तिलक, राघव, रावण के शत्रु — उन रामचंद्र को मैं वंदन करता हूँ।
35
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥
राम को, रामभद्र को, रामचंद्र को, विधाता को; रघुनाथ को, नाथ को, सीता के पति को — नमस्कार।
36
श्री राम राम रघुनन्दन राम राम श्री राम राम भरताग्रज राम राम ।
श्री राम राम रणकर्कश राम राम श्री राम राम शरणं भव राम राम ॥
श्री राम राम — हे रघुनंदन राम राम। श्री राम राम — हे भरत के अग्रज राम राम। श्री राम राम — हे रणकर्कश राम राम। श्री राम राम — शरण हो जाओ राम राम।
37
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥
जो भक्त श्रद्धापूर्वक इनका नित्य जप करता है, वह निःसंदेह अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य प्राप्त करता है।
38
रामं दशरथं जानकीं लक्ष्मणं रघुनन्दनम् ।
एकैकस्य तु नामस्य सर्वपापं प्रणश्यति ॥
राम, दशरथ, जानकी, लक्ष्मण, रघुनंदन — इनमें से एक-एक नाम के उच्चारण मात्र से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।