धर्म, कर्म एवं मोक्ष
ज्योतिष नियतिवाद नहीं है। जानें कैसे ज्योतिष इच्छाशक्ति, चार पुरुषार्थ, पूर्वजन्म के कर्म, आध्यात्मिक स्वभाव और मोक्ष के मार्ग को प्रकाशित करता है।
लेख: धर्म, कर्म एवं मोक्ष
ज्योतिष नियतिवाद नहीं है। जानें कैसे ज्योतिष इच्छाशक्ति, चार पुरुषार्थ, पूर्वजन्म के कर्म, आध्यात्मिक स्वभाव और मोक्ष के मार्ग को प्रकाशित करता है।
क्या वैदिक ज्योतिष भाग्यवादी है? स्वतंत्र इच्छा का उत्तर
क्या वैदिक ज्योतिष भाग्यवाद सिखाता है? कर्म, पुरुषार्थ और स्वतंत्र इच्छा के संतुलित मध्य मार्ग की शास्त्रीय व्याख्या और कुंडली-पठन की व्यावहारिक दृष्टि।
धर्म, कर्म एवं मोक्षवैदिक ज्योतिष में स्वतंत्र इच्छा व नियति: शास्त्रीय दृष्टि
पराशर, जैमिनी और शास्त्रीय कर्म-दर्शन से समझें कि कुंडली में क्या प्रारब्ध है, वर्तमान कर्म आगामी को कैसे बनाता है, और संचित कर्म क्या बताता है।
धर्म, कर्म एवं मोक्षवैदिक जन्म कुंडली में कर्म कैसे पढ़ा जाता है
कौन से भाव पूर्वजन्म के कर्म को दिखाते हैं (5, 8, 12), उन भावों में ग्रह कर्म-विषय कैसे बताते हैं, और कुंडली में कर्मभार पढ़ने का व्यावहारिक ढाँचा।
धर्म, कर्म एवं मोक्षकुंडली में चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष)
वैदिक कुंडली के बारह भाव चार त्रिकोणों में कैसे बँटते हैं: धर्म 1/5/9, अर्थ 2/6/10, काम 3/7/11, मोक्ष 4/8/12, और जीवन-संतुलन स्पष्ट रूप से कैसे पढ़ें।
धर्म, कर्म एवं मोक्षज्योतिष में मोक्ष का वास्तविक अर्थ क्या है?
मोक्ष अंतिम पुरुषार्थ के रूप में, द्वादश भाव, केतु और मीन मिलकर कुंडली में मुक्ति-क्षेत्र कैसे बनाते हैं, और आध्यात्मिक संकेत क्या दिखाते हैं।
धर्म, कर्म एवं मोक्षक्या ज्योतिष आपके स्वधर्म को समझने में मदद कर सकता है?
स्वधर्म, यानी अपना धर्ममार्ग, जिसे दशम भाव, आत्मकारक और पाँच-भाव की व्यावहारिक श्रृंखला से पढ़ा जाता है। ज्योतिष क्या स्पष्ट कर सकता है और क्या नहीं।
धर्म, कर्म एवं मोक्षआपकी कुंडली कैसे दिखाती है आपका आध्यात्मिक स्वभाव
द्वादश भाव, केतु, नवम स्वामी, बृहस्पति और चंद्रमा से समझें कि वैदिक कुंडली आध्यात्मिक रुझान, धर्म, साधना और अंतर्मुखी स्वभाव कैसे दिखाती है।
धर्म, कर्म एवं मोक्षकठिन ग्रह आध्यात्मिक रूप से सहायक क्यों हो सकते हैं
नीच, पीड़ित और 'पाप' ग्रह गहरी कार्मिक शिक्षा कैसे ला सकते हैं, और कठिन ग्रह-स्थितियों को दुर्भाग्य नहीं, धर्म के क्षेत्र के रूप में कैसे पढ़ें।
धर्म, कर्म एवं मोक्षपूर्व जन्म का कर्म: पंचम, अष्टम और द्वादश भाव
कर्मिक त्रयी: पंचम (पूर्व पुण्य), अष्टम (अचानक कर्मिक उथल-पुथल) और द्वादश (कर्म-क्षय) भाव। राहु-केतु अक्ष सहित पूर्व जन्म के सूत्र स्पष्ट पढ़ें।