स्तोत्र
हनुमान बाहुक Hanumān Bāhuk
हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास (लगभग १५३२–१६२३ ई.) की ४४ पदों की एक भावपूर्ण हिन्दी/अवधी रचना है, जो रामचरितमानस के रचयिता की सर्वाधिक आत्मीय कृतियों में गिनी जाती है। पारम्परिक जीवनी के अनुसार,
1
सिन्धु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन-तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल, कालहु-को-काल जनु ॥
गहन-दहन-निरदहन-लंक-निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवन-सुव ॥
कह तुलसिदास, सेवत सुलभ, सेवक-हित-सन्तत-निकट ।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत, समन सकल-संकट-बिकट ॥
भुज बिसाल, मूरति कराल, कालहु-को-काल जनु ॥
गहन-दहन-निरदहन-लंक-निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवन-सुव ॥
कह तुलसिदास, सेवत सुलभ, सेवक-हित-सन्तत-निकट ।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत, समन सकल-संकट-बिकट ॥
जिन्होंने समुद्र पार किया, सीताजी का शोक हरा, जिनका शरीर उगते सूर्य के समान तेजस्वी है, जिनकी भुजाएँ विशाल और रूप भयंकर है — मानो काल का भी काल। जिन्होंने निर्भय होकर लंका के घने वनों और नगर को जलाया, जिनकी भौंहें टेढ़ी हैं, वे पवनपुत्र जिन्होंने राक्षसों का मान-मर्दन किया। तुलसीदास कहते हैं: सेवकों की भलाई के लिए वे सदा निकट हैं; उनके गुण गाने, नमन, स्मरण और नाम-जप से सब प्रकार के भीषण संकट दूर होते हैं।
2
जामवन्त के बचन सुहाए ।
सुनि हनुमन्त हृदय हरषाए ॥
तब हनुमन्त बिकल तन-माहीं ।
मन महँ राम-चरन-लौ लाहीं ॥
सुनहु देव संकट अति भारी ।
धावत मन उर अगुन बिचारी ॥
दसानन सम सठ को हमारा ।
जग माहीं खल कवन हमारा ॥
कह तुलसी जो भजइ राम-हित, बंधन मुक्त सदा सो होई ।
हनुमान-बाहुक पाठ करत नित, बाधा दूर करत सब कोई ॥
सुनि हनुमन्त हृदय हरषाए ॥
तब हनुमन्त बिकल तन-माहीं ।
मन महँ राम-चरन-लौ लाहीं ॥
सुनहु देव संकट अति भारी ।
धावत मन उर अगुन बिचारी ॥
दसानन सम सठ को हमारा ।
जग माहीं खल कवन हमारा ॥
कह तुलसी जो भजइ राम-हित, बंधन मुक्त सदा सो होई ।
हनुमान-बाहुक पाठ करत नित, बाधा दूर करत सब कोई ॥
जब जाम्बवन्त के मनोहर वचन हनुमान्जी ने सुने, तो उनका हृदय हर्षित हो गया। तब हनुमान्जी का तन व्याकुल हो उठा; उनके मन में राम-चरणों की लौ जल उठी। हे देव! मेरा संकट अत्यंत भारी है; मेरा चंचल मन गुण-दोष का विचार करते हुए इधर-उधर भागता है। दशानन के समान मूर्ख और हमारा शत्रु कौन है? संसार में उस जैसा दुष्ट कौन है? तुलसी कहते हैं: जो राम के हित भजन करता है वह सदा बन्धन से मुक्त होता है; जो नित्य हनुमान बाहुक का पाठ करता है, उसकी सब बाधाएँ दूर होती हैं।
3
रामचन्द्र-कृपालु भज मन हरण-भव-भय-दारुणम् ।
नव-कञ्ज-लोचन, कञ्ज-मुख, कर-कञ्ज-पद-कञ्जारुणम् ॥
कन्दर्प-अगणित-अमित-छबि, नव-नील-नीरज-सुन्दरम् ।
पट-पीत-मानहुँ तड़ित-रुचि-शुचि-नौमि जनक-सुता-वरम् ॥
नव-कञ्ज-लोचन, कञ्ज-मुख, कर-कञ्ज-पद-कञ्जारुणम् ॥
कन्दर्प-अगणित-अमित-छबि, नव-नील-नीरज-सुन्दरम् ।
पट-पीत-मानहुँ तड़ित-रुचि-शुचि-नौमि जनक-सुता-वरम् ॥
हे मन! उन कृपालु रामचन्द्र को भज जो भव-भय के दारुण संकट को हरते हैं — जिनके नेत्र नवल कमल के समान हैं, मुख कमल-सा है, हाथ और पाद कमल के समान अरुण हैं। उनकी छवि कामदेव से भी असंख्य गुनी अधिक है, वे नवल नीलकमल की तरह सुन्दर श्यामल हैं, पीताम्बर धारण किए — मानो बिजली की उज्ज्वल चमक हो; उन शुद्ध जनक-तनया-पतिको मैं नमन करता हूँ।
4
कायर, क्लीव, कुलीन, कठिन, कलि-काल-करालु ।
काम, क्रोध, मद-मत्त-महाभट, भट-बिकट-बिकालु ॥
भवन-भीत-भव-पीर-प्रचण्ड, भट-भीत-भटू ।
तुलसी-के-भय-हरन-हेतु, हनुमान-बाहुक-टू ॥
काम, क्रोध, मद-मत्त-महाभट, भट-बिकट-बिकालु ॥
भवन-भीत-भव-पीर-प्रचण्ड, भट-भीत-भटू ।
तुलसी-के-भय-हरन-हेतु, हनुमान-बाहुक-टू ॥
तुलसीदास स्वयं को कायर, क्लीव, और इस कठिन कलिकाल का सामना करने वाला मानते हैं — काम, क्रोध, मद रूपी महाबलशाली भटों (योद्धाओं) से घिरे हुए। वे संसार के भय से त्रस्त, भव-पीड़ा की प्रचण्डता से पीड़ित हैं। यह हनुमान बाहुक तुलसी का भय हरने के लिए है — यही इसका उद्देश्य है।
5
पाँय परौं हनुमान के पुनि पुनि हित जानि ।
तुलसी लाज न करत क्यों कहत निज भेद खानि ॥
जाचत हौं जगजीव-जोनि-सुजन-साधु-संग ।
राम-भक्ति, हनुमन्त-कृपा, मुखहिं मंगल-रंग ॥
तुलसी लाज न करत क्यों कहत निज भेद खानि ॥
जाचत हौं जगजीव-जोनि-सुजन-साधु-संग ।
राम-भक्ति, हनुमन्त-कृपा, मुखहिं मंगल-रंग ॥
मैं अपने हित जानकर बारम्बार हनुमान के पाँव पड़ता हूँ। तुलसी को लज्जा क्यों नहीं आती — अपने अन्तर की खान (रहस्य) को उद्घाटित करते हुए? मैं जगत में सुजन-साधु-संग, राम-भक्ति, हनुमान की कृपा और मुख पर मंगल-रंग (प्रसन्नता और मर्यादा) की याचना करता हूँ।
6
राम-नाम-नभ-तारगन, गनहिं जे नर-नारि ।
तिन्ह के बल लेखे बिना, सब सुख साधन सारि ॥
सब बिधि भव-बन्धन-बिमोचन को हेतु ।
हनुमन्त सहाय, तुलसिदास नाहि नित-नेतु ॥
तिन्ह के बल लेखे बिना, सब सुख साधन सारि ॥
सब बिधि भव-बन्धन-बिमोचन को हेतु ।
हनुमन्त सहाय, तुलसिदास नाहि नित-नेतु ॥
जो नर-नारी राम-नाम रूपी आकाश के तारों को गिनते हैं — उनके बल को हिसाब में लिए बिना सभी सुख के साधन झूठे हैं। सब प्रकार के भव-बन्धन से मुक्ति का एकमात्र हेतु है — हनुमान का साथ; उनके बिना तुलसीदास का कोई नित्य सहारा नहीं है।
7
बाढ़त बाधा बहु बिधि, घटत न एकौ बार ।
तुलसी-हिय हनुमन्त-बिनु, को है सहायकार ॥
रहिबे को घर दोउ नहिं, लखि महामहिमाय ।
सुमिरत सुग्रीव को सुग्रीव-बन्धु राम-राय ॥
तुलसी-हिय हनुमन्त-बिनु, को है सहायकार ॥
रहिबे को घर दोउ नहिं, लखि महामहिमाय ।
सुमिरत सुग्रीव को सुग्रीव-बन्धु राम-राय ॥
बाधाएँ अनेक प्रकार से बढ़ती हैं परन्तु एक बार भी घटती नहीं। तुलसी के हृदय में — हनुमान के बिना — कौन सहायक है? दोनों लोकों में कोई आश्रय नहीं जब उस महामहिमा को देखते हैं। जब सुग्रीव को स्मरण करते हैं तो उनके बन्धु राम-राय स्वयं आते हैं।
8
तव-भुज-बल-बिराजित, जग-बिजय-बीर ।
रामदूत-रुचिर-रूप, प्रचण्ड-बिधिर ॥
भव-तरन-करन-हेतु, हनुमन्त बिदित ।
तुलसी-तन-मन-मुदित, भव-भीति-बिनित ॥
रामदूत-रुचिर-रूप, प्रचण्ड-बिधिर ॥
भव-तरन-करन-हेतु, हनुमन्त बिदित ।
तुलसी-तन-मन-मुदित, भव-भीति-बिनित ॥
आप अपनी भुजाओं के बल से सुशोभित हैं, जगत्-विजयी वीर हैं, सुन्दर रूप वाले रामदूत हैं, प्रचण्ड शक्तिसम्पन्न हैं। यह सर्वविदित है कि हनुमान भव-सागर तरने के हेतु हैं। तुलसी का तन-मन प्रसन्न हो और भव-भय विनम्र हो।
9
बाँधे-बिसारत, चाहत-चारु-चरित्र ।
जानत, जन-जात, जग-जाहिर-पवित्र ॥
तुलसिदास-दास-रघुनाथ-निज-जान ।
छोड़हु न छाँड़हु जानि, हनुमन्त-महान ॥
जानत, जन-जात, जग-जाहिर-पवित्र ॥
तुलसिदास-दास-रघुनाथ-निज-जान ।
छोड़हु न छाँड़हु जानि, हनुमन्त-महान ॥
जो बँधे हुए हैं, जो सुन्दर चरित्र की कामना करते हैं, जो जानते हैं, जो भक्त रूप में जन्मे हैं, जो जगत् में पवित्र और विख्यात हैं — तुलसीदास रघुनाथ का दास है, उसे अपना जानो। हे महान् हनुमान! उसे मत छोड़ो, मत त्यागो।
10
यह जिय जानि जनावत, हौं तुलसिदास ।
राम-रूप-गुन-गान, कहत, हौं दास-दास ॥
देखत दाहिनी ओर, दसन-दस-आन ।
जगत-जोनि-जुगल, जत, हनुमन्त-जान ॥
राम-रूप-गुन-गान, कहत, हौं दास-दास ॥
देखत दाहिनी ओर, दसन-दस-आन ।
जगत-जोनि-जुगल, जत, हनुमन्त-जान ॥
यह मन में जानकर मैं तुलसीदास निवेदन करता हूँ: मैं राम के रूप और गुणों का गान करता हूँ, मैं स्वयं को दास-का-दास कहता हूँ। दाहिनी ओर देखते हुए, दस-दिवसीय व्रत की प्रतिज्ञा लेकर — जगत की दोनों योनियों में हनुमान ही सब देने वाले हैं, ऐसा जानो।
11
तुलसी-तन-थकित-दुखित-दाह-ज्वर-जोर ।
काम-क्रोध-मद-मत्त-मन, लग्यो लोभ-चोर ॥
हानि लाभ बिनु होत, बहु भाँति भावी ।
हनुमन्त सहाय, तासु सेवक पढ़ावी ॥
काम-क्रोध-मद-मत्त-मन, लग्यो लोभ-चोर ॥
हानि लाभ बिनु होत, बहु भाँति भावी ।
हनुमन्त सहाय, तासु सेवक पढ़ावी ॥
तुलसी का शरीर थका हुआ है, दाह-ज्वर की पीड़ा से व्यथित है; मन काम-क्रोध-मद से मतवाला है, लोभ-चोर ने उसे जकड़ा है। भाग्यवश अनेक प्रकार से हानि-लाभ होती है — परन्तु हनुमान के साथ के साथ, उनका वह सेवक जो इस स्तोत्र का पाठ करता है, रक्षित होगा।
12
बाहु-पीर, पेट-पीर, बाँहु-पीर-दारुन ।
पीर-परिहारन-को, एक हनुमन्त-कारुन ॥
लाज न, काज न, आज नहिं पाज तुलसी ।
भजि हनुमन्त-महन्त, छाँड़ि सब साज तुलसी ॥
पीर-परिहारन-को, एक हनुमन्त-कारुन ॥
लाज न, काज न, आज नहिं पाज तुलसी ।
भजि हनुमन्त-महन्त, छाँड़ि सब साज तुलसी ॥
भुजाओं में पीड़ा, पेट में पीड़ा, अंगों में भयंकर पीड़ा — इस पीड़ा के परिहार के लिए एकमात्र कारुणिक हनुमान हैं। हे तुलसी! न लाज है, न काज है, आज कोई मर्यादा नहीं — हे तुलसी! सब बाहरी सज-धज छोड़कर महान् हनुमान को भजो। यह 'बाहु-पीर' का उल्लेख इस स्तोत्र को उसका नाम देता है।
13
पाँय परत, पुकारत, प्रान-प्रिय-हेतु ।
तुलसी-की-लाज-राखु, हनुमन्त-सेतु ॥
जग-जाहिर, जन-मन-रंजन-राम-राय ।
राखु भक्ति, देहु शक्ति, ताकि बिनती-आय ॥
तुलसी-की-लाज-राखु, हनुमन्त-सेतु ॥
जग-जाहिर, जन-मन-रंजन-राम-राय ।
राखु भक्ति, देहु शक्ति, ताकि बिनती-आय ॥
चरणों में गिरकर और पुकारते हुए, अपने प्राणप्रिय के लिए — हे सेतु (पुल) हनुमान! तुलसी की लाज रखो। जगत् में विख्यात, भक्तों के मन को आनन्दित करने वाले राम-राय — भक्ति रखो, शक्ति दो; यही विनती आपके पास आती है।
14
रावण-दमन, राम-काज-करन, धन-धीर ।
सीता-सुधि-साधन, साँचो, सुभट-सुबीर ॥
दीन-जन-दयालु, दास, तुलसी-दुखी ।
लाजि लगाव, जानि जन, हनुमन्त-सुखी ॥
सीता-सुधि-साधन, साँचो, सुभट-सुबीर ॥
दीन-जन-दयालु, दास, तुलसी-दुखी ।
लाजि लगाव, जानि जन, हनुमन्त-सुखी ॥
रावण के दमनकर्ता, राम के काज करने वाले, धैर्य-धन — जिन्होंने सच्चाई से सीता का पता लगाया, सुभट-सुवीर। दीन-जनों पर दयालु, दास तुलसीदास दुखी है — शर्म आने पर भी (मुझे न नकारो), अपना जन जानकर, हे प्रसन्न हनुमान! अपना बनाओ।
15
हनुमन्त-हित, रामहित, भगत-हित-साधन ।
करत सदा कल्यान, पवित्र-सुभ-आधन ॥
तुलसी-को-तन, तब लगिं, रहु-हित-जानि ।
जब लगिं राम-नाम-रस, रहे मन-मानि ॥
करत सदा कल्यान, पवित्र-सुभ-आधन ॥
तुलसी-को-तन, तब लगिं, रहु-हित-जानि ।
जब लगिं राम-नाम-रस, रहे मन-मानि ॥
हनुमान के हित, राम के हित और भक्तों के हित की सिद्धि के लिए — सदा कल्याण करने वाले, पवित्र-शुभ के आधार। तुलसी के इस शरीर को, इसे अपना हित जानकर, तब तक रखो — जब तक कि राम-नाम का रस मन में रमा रहे।
16
जानत जन-गुन-दोष, न जनमत दूरि ।
पूरन-काम, पवित्र-करन, सेवक-सुरि ॥
हनुमन्त-महाबीर-बिरद, बड़ो-बिरद-बल ।
तुलसी-दास-दयानिधि, दिलावहु-दल ॥
पूरन-काम, पवित्र-करन, सेवक-सुरि ॥
हनुमन्त-महाबीर-बिरद, बड़ो-बिरद-बल ।
तुलसी-दास-दयानिधि, दिलावहु-दल ॥
जो भक्तों के गुण-दोष जानते हैं, फिर भी दूर नहीं रहते — काम पूरा करने वाले, पावन करने वाले, सेवकों के शूर। हनुमान महावीर का विरद (कीर्ति/प्रतिज्ञा) महान् है, उस विरद का बड़ा बल है — हे दयानिधि! दास तुलसी को (आपकी) सेना दिलवाइए।
17
तेरी सरन, तेरो नाम, नित लेत सोई ।
जन-जाति, देखि-अनुकूल, प्रसन्न होई ॥
तुलसी-की-आस, बड़ी-बलाय मिटाव ।
जाहि डर लागत, सोई डर दूर हटाव ॥
जन-जाति, देखि-अनुकूल, प्रसन्न होई ॥
तुलसी-की-आस, बड़ी-बलाय मिटाव ।
जाहि डर लागत, सोई डर दूर हटाव ॥
आपकी शरण में, आपका नाम नित्य लेते हुए — भक्त-जाति को अनुकूल देखकर प्रसन्न होइए। तुलसी की आशा — बड़ी बलाय को मिटाइए; जिस भय से डर लग रहा है, उस भय को दूर हटाइए।
18
जय जय जय हनुमन्त, अगाध-बल ।
जय जय जय जगपाल, रखे सब-कल ॥
कपिनायक, रन-धीर, महाबलबान ।
तुलसी-को-तारो, दास, करि अभिमान ॥
जय जय जय जगपाल, रखे सब-कल ॥
कपिनायक, रन-धीर, महाबलबान ।
तुलसी-को-तारो, दास, करि अभिमान ॥
जय जय जय अगाध-बलशाली हनुमान! जय जय जय जगपालक, जो सर्वकाल सबकी रक्षा करते हैं! कपिनायक, रण में धीर, महाबलवान — हे महान्! अभिमान करके, दास तुलसी को (भव-सागर से) तार दो।
19
काल-करम-बस, परे, तन-मन-सोच ।
हनुमन्त-बिनु, न राखे, कोऊ ओच ॥
तुलसिदास-दास-राम-काज-कारन ।
बंधन-मोचन, हे प्रभु, करहु-निवारन ॥
हनुमन्त-बिनु, न राखे, कोऊ ओच ॥
तुलसिदास-दास-राम-काज-कारन ।
बंधन-मोचन, हे प्रभु, करहु-निवारन ॥
काल और कर्म के वश में पड़कर, तन-मन सोच (दुःख) में डूबे हैं। हनुमान के बिना, कोई रक्षक नहीं। रामकाज के कारण दास तुलसी के लिए — हे बन्धन-मोचन प्रभु! निवारण (बाधाओं को हटाना) करो।
20
लंक-दहन, सिय-सुधि-आहरन-हेतु ।
रबि-ग्रहन, सुभट-समर-जेतु ॥
सेवत-सुलभ, स्वामि-हित, सन्तत-करु ।
तुलसी-दास-दुख-दारुन, दूर-टरु ॥
रबि-ग्रहन, सुभट-समर-जेतु ॥
सेवत-सुलभ, स्वामि-हित, सन्तत-करु ।
तुलसी-दास-दुख-दारुन, दूर-टरु ॥
लंका जलाने वाले, सीता की सुधि लेने के हेतु — सूर्य को (बचपन में) ग्रहण करने वाले, उत्कृष्ट योद्धाओं को समर में जीतने वाले। सेवा करने में सुलभ, स्वामी के हित के लिए सदा कार्यरत — दास तुलसी के भयंकर दुःख को दूर करो।
21
जग-मंगल-रूप, जन-मन-रंजन ।
रण-धीर, समर-सुभट-भंजन ॥
तुलसी-की-त्रास, दूर-टारु, दोष ।
हनुमन्त-महान्, दे मोहि-सन्तोष ॥
रण-धीर, समर-सुभट-भंजन ॥
तुलसी-की-त्रास, दूर-टारु, दोष ।
हनुमन्त-महान्, दे मोहि-सन्तोष ॥
जगत् के मंगल रूप, भक्तों के मन को आनन्दित करने वाले — रण में धीर, समर में उत्कृष्ट योद्धाओं के भंजक। तुलसी के त्रास और दोषों को दूर करो, हे महान् हनुमान! मुझे सन्तोष दो।
22
राम-रूप-गुन-गान-सुमिरन-हेतु ।
पाप-हरन, भव-तरन-सेतु ॥
कहत तुलसिदास, करहु संकट-नाश ।
हनुमन्त-बाहुक, करहु सफल अभिलाष ॥
पाप-हरन, भव-तरन-सेतु ॥
कहत तुलसिदास, करहु संकट-नाश ।
हनुमन्त-बाहुक, करहु सफल अभिलाष ॥
राम के रूप और गुणों के गान-स्मरण के हेतु — पाप हरने वाले, भव तरने के सेतु। तुलसीदास कहते हैं: हे हनुमान बाहुक! संकट का नाश करो और अभिलाषा को सफल करो।
23
हनुमन्त-बाहुक-जे नर-नारि पढ़ेंगे ।
काम-क्रोध-मद-लोभ-मोह सब छेड़ेंगे ॥
जे सुनेंगे भक्ति-सहित-नित-नेम धरि ।
तिन-को-सकल-दुख-संकट-मिटि जाय हरि ॥
काम-क्रोध-मद-लोभ-मोह सब छेड़ेंगे ॥
जे सुनेंगे भक्ति-सहित-नित-नेम धरि ।
तिन-को-सकल-दुख-संकट-मिटि जाय हरि ॥
जो नर-नारी हनुमान बाहुक पढ़ेंगे — वे सभी काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह को त्याग देंगे। जो भक्ति-सहित नित्य नेम (नियम) धरकर सुनेंगे — उनके समस्त दुःख और संकट हरि द्वारा मिट जाएँगे।
24
जो पढ़ेगो चालीस-दिवस, नेम लगाय ।
तासु घर में सुख-सम्पदा, हनुमन्त-पाय ॥
रोग-शोक-संकट-बाधा, दूर हटाय ।
तुलसी-दास-कृत-बाहुक, सेवत-सहाय ॥
तासु घर में सुख-सम्पदा, हनुमन्त-पाय ॥
रोग-शोक-संकट-बाधा, दूर हटाय ।
तुलसी-दास-कृत-बाहुक, सेवत-सहाय ॥
जो नियम लगाकर चालीस दिन पढ़ेगा — उसके घर में हनुमान के प्रताप से सुख-सम्पदा आएगी। रोग, शोक, संकट और बाधाएँ दूर हट जाएँगी। तुलसीदास कृत यह बाहुक, सेवा करने वालों का सहायक है।
25
काहे को रोवत हौ भाई, काहे को सोचत हौ ।
काहे को डरपत हौ, सुनहु मोरि बात रे ॥
एकहिं आसरे पाइहौ, सबहिं ठाढ़ो हनुमन्त ।
तुलसी-को-राम-दूत, राखे सब घात रे ॥
काहे को डरपत हौ, सुनहु मोरि बात रे ॥
एकहिं आसरे पाइहौ, सबहिं ठाढ़ो हनुमन्त ।
तुलसी-को-राम-दूत, राखे सब घात रे ॥
भाई, क्यों रोते हो? क्यों सोच में पड़े हो? क्यों डरते हो? मेरी बात सुनो — एक ही आसरे से सब पाओगे; हनुमान सबके लिए खड़े हैं। तुलसी के राम-दूत हनुमान हर घड़ी (या हर प्रहार से) रक्षा करते हैं।
26
दीनन को दयालु, सरन-आएन को सहाई ।
बड़े-बिरद-बल-बान, सुजन-सुभट-सूर रे ॥
चारि-बेद-पुरान-कहैं, सब-जन-हित-हेतु ।
हनुमन्त-को-नाम, जपहु, भव-तरहु-भूर रे ॥
बड़े-बिरद-बल-बान, सुजन-सुभट-सूर रे ॥
चारि-बेद-पुरान-कहैं, सब-जन-हित-हेतु ।
हनुमन्त-को-नाम, जपहु, भव-तरहु-भूर रे ॥
दीनों पर दयालु, शरण में आने वालों के सहायक — महान् विरद-बल-बाण वाले, सुजन-सुभट-सूर। चारों वेद-पुराण कहते हैं, सभी जनों के हित के लिए: हनुमान का नाम जपो और भव-सागर से अवश्य (या शीघ्र) पार हो जाओ।
27
तुलसी-की-इच्छा, राम-दरसन-की आस ।
करहु-कृपा-निधान, हनुमन्त-जान दास ॥
देहु-भक्ति-निर्मल, देहु शक्ति-प्रचण्ड ।
दूर-कर-दुख-दारुन, हनुमन्त-प्रचण्ड ॥
करहु-कृपा-निधान, हनुमन्त-जान दास ॥
देहु-भक्ति-निर्मल, देहु शक्ति-प्रचण्ड ।
दूर-कर-दुख-दारुन, हनुमन्त-प्रचण्ड ॥
तुलसी की इच्छा — राम के दर्शन की आस है। हे कृपानिधान हनुमान! इस दास को जानो। निर्मल भक्ति दो, प्रचण्ड शक्ति दो। हे प्रचण्ड हनुमान! भयंकर दुःख को दूर करो।
28
राम-भक्ति-पथ-देखाव, तुलसी-को-हेतु ।
हनुमन्त-जन-हित, भव-तरन-सेतु ॥
बाहु-रोग-हरन, करुना-सिन्धु-बड़े ।
सकट-मोचन-रूप, हनुमन्त-गढ़े ॥
हनुमन्त-जन-हित, भव-तरन-सेतु ॥
बाहु-रोग-हरन, करुना-सिन्धु-बड़े ।
सकट-मोचन-रूप, हनुमन्त-गढ़े ॥
तुलसी के हित राम-भक्ति का मार्ग दिखाओ — हे हनुमान! जनहित के लिए, भव तरने के सेतु। बाहु-रोग हरने वाले, महान् करुणा के सागर — संकट-मोचन रूप में स्थापित हनुमान।
29
तुलसिदास-की-बिनती, सुनहु-दयालु ।
सेवक-सुखदाई, कृपालु-बड़े ॥
भव-बाधा-हरहु, हनुमन्त-अनुकूल ।
जय-जय-जय-बाहुक, राम-दूत-ढाल ॥
सेवक-सुखदाई, कृपालु-बड़े ॥
भव-बाधा-हरहु, हनुमन्त-अनुकूल ।
जय-जय-जय-बाहुक, राम-दूत-ढाल ॥
हे दयालु! तुलसीदास की विनती सुनो — सेवकों को सुख देने वाले, बड़े कृपालु। हे अनुकूल हनुमान! भव की बाधाओं को हरो। जय जय जय बाहुक — राम-दूत ढाल।
30
कहौं हनुमान सों सुजान, रामराय सों ।
आरत-जन-त्रान, कृपानिधान, हाय सों ॥
देव दनुज नर, खग मृग बिहग, सों ।
तुलसी-को-दुख, हनुमन्त, हरहु आज सों ॥
आरत-जन-त्रान, कृपानिधान, हाय सों ॥
देव दनुज नर, खग मृग बिहग, सों ।
तुलसी-को-दुख, हनुमन्त, हरहु आज सों ॥
मैं सुजान हनुमान से, राम-राय के माध्यम से कहता हूँ — हे आर्त-जन-त्राण (पीड़ितों के रक्षक), हे कृपानिधान, इस हाय (पुकार) के साथ। देव, दनुज, नर, खग, मृग, विहग — सबके सम्मुख: हे हनुमान! तुलसी के दुःख को आज से ही हरो।