संक्षिप्त उत्तर: षष्ठ भाव (रिपु भाव तथा शत्रु भाव) केवल अशुभ भाव नहीं है। यह कुंडली में संघर्ष की पाठशाला है, जहाँ ऋण, रोग, शत्रु, मुकदमेबाजी, सेवा, दैनिक श्रम और षड्रिपु, अर्थात् भीतर के छह शत्रु, एक साथ पढ़े जाते हैं। क्योंकि यह एक ओर दुःस्थान है और दूसरी ओर उपचय भाव, इसलिए जो दबाव पहले चोट पहुँचाता है वही नियमित प्रयास और अनुशासन से शक्ति भी बन सकता है। पाप ग्रह यहाँ प्रायः अधिक कारगर होते हैं, क्योंकि षष्ठ भाव साहस, धैर्य और सीधे सामना करने की क्षमता माँगता है। इसलिए बलशाली और समर्थित षष्ठ भाव संघर्ष-मुक्त जीवन का वादा नहीं करता। वह संघर्ष को साधने, ऋण चुकाने, रोग से जूझने और सेवा को स्वतंत्रता का मार्ग बनाने की क्षमता दिखाता है।
षष्ठ भाव के शास्त्रीय कारकत्व
संस्कृत नाम: रिपु भाव, शत्रु भाव और षड्रिपु भाव
षष्ठ भाव के नाम ही बताते हैं कि यहाँ विरोध केवल एक रूप में नहीं आता। रिपु भाव (रिपु भाव) उस वैरी को दिखाता है जो हानि पहुँचाता है। शत्रु भाव (शत्रु भाव) उस प्रतिपक्षी को सामने लाता है जो खुलकर या परिस्थिति के माध्यम से चुनौती देता है। अरि भाव (अरि भाव) शत्रु के पुराने संस्कृत शब्द को सँभालता है, और रोग भाव (रोग भाव) उसी संघर्ष को शरीर के भीतर ले आता है।
इन नामों में सबसे गहरा नाम षड्रिपु भाव (षड्रिपु भाव) है, अर्थात् छह आंतरिक शत्रुओं का भाव। ये षड्रिपु हैं: काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर्य। इस स्तर पर शत्रु केवल बाहर खड़ा व्यक्ति नहीं रह जाता। वह भीतर की वह प्रवृत्ति भी बन जाता है जो निर्णय, स्वास्थ्य और संबंधों में घर्षण पैदा करती है। भगवद्गीता 16.21 में विशेष रूप से काम, क्रोध और लोभ को आत्म-विनाश के द्वार कहा गया है। ज्योतिष इसी मनोविज्ञान को दैनिक कर्मक्षेत्र में पढ़ता है, जहाँ बाहरी शत्रु और भीतरी आवेग अक्सर एक-दूसरे का प्रतिबिंब बन जाते हैं।
यह चर्चा पाराशरी परम्परा का अनुसरण करती है। बृहत् पराशर होरा शास्त्र ज्योतिष की होरा शाखा का आधारभूत ग्रन्थ है। इस पद्धति में भाव को किसी एक घटना की तरह नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े विषयों के क्षेत्र की तरह पढ़ा जाता है। षष्ठ भाव इसी तरह शत्रु, रोग, ऋण, विवाद, घाव, सेवक-अधीनस्थ और मातुल को एक साझा संदर्भ में समेटता है।
ये विषय अलग-अलग खानों में बंद नहीं हैं। हर जगह व्यक्ति किसी न किसी बन्धन, दायित्व, घर्षण, सेवा या सुधार की स्थिति में आता है। इसलिए षष्ठ भाव को पढ़ते समय प्रश्न केवल यह नहीं होता कि कष्ट कहाँ है। साथ ही यह भी देखना होता है कि व्यक्ति उस कष्ट में डूबे बिना उसका उत्तर कैसे देता है।
षष्ठ भाव के मूल कारकत्व
नीचे दिए गए कारकत्वों को अलग-अलग सूची की तरह नहीं, एक जुड़े हुए मानचित्र की तरह पढ़ना चाहिए। शत्रु, रोग, ऋण, सेवा और षड्रिपु अलग विषय लगते हैं, पर षष्ठ भाव में ये सब उस जगह मिलते हैं जहाँ जीवन व्यक्ति से सुधार, श्रम और संयम माँगता है।
| कारकत्व | संस्कृत शब्द | व्यावहारिक अर्थ |
|---|---|---|
| शत्रु एवं प्रतिद्वंद्वी | शत्रु / रिपु | प्रतियोगी, ईर्ष्यालु प्रतिद्वंद्वी, वादी और सेवा या संस्थागत पदानुक्रम से उठने वाले विरोधी |
| रोग एवं अस्वस्थता | रोग | तीव्र एवं दीर्घकालिक रोग, शारीरिक दुर्बलताएँ |
| ऋण एवं दायित्व | ऋण | वित्तीय ऋण, कार्मिक दायित्व, देनदारियाँ |
| सेवा एवं दैनिक कार्य | सेवा | नौकरी, सेवा, नित्यकर्म, अधीनस्थ भूमिकाएँ |
| मुकदमेबाजी एवं विवाद | विवाद | न्यायालयी मामले, अनुबंध-विवाद, कानूनी झगड़े |
| सेवक एवं अधीनस्थ | दास / कर्मचारी | कर्मचारी, सहायक, कुंडलीधारी की सेवा करने वाले |
| छोटे पशु | क्षुद्र पशु | पालतू जानवर, पशुधन, घरेलू छोटे पशु |
| मातुल | मामा | माता के भाई (मामा) - शास्त्रीय कारकत्व |
| षड्रिपु | षड्रिपु | काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर्य |
तालिका का पहला समूह बाहरी विरोध दिखाता है: शत्रु, प्रतिद्वंद्वी, मुकदमे और विवाद। दूसरा समूह भीतर की देह और दायित्व से जुड़ता है: रोग, ऋण और वे जिम्मेदारियाँ जिन्हें टाला नहीं जा सकता। तीसरा समूह सेवा, कर्मचारी, छोटे पशु और मातुल जैसे संबंधों से बनता है, जहाँ व्यक्ति को किसी व्यवस्था में अपना काम निभाना पड़ता है।
इसीलिए षष्ठ भाव का फल केवल “कष्ट” कहकर समाप्त नहीं होता। यदि रोग दिखे तो उपचार और दिनचर्या भी देखी जाती है। यदि शत्रु दिखे तो रणनीति और धैर्य भी देखे जाते हैं। यदि ऋण दिखे तो भुगतान की क्षमता और अनुशासन भी पढ़े जाते हैं। यही षष्ठ भाव को कठिन होते हुए भी उपयोगी बनाता है।
दुःस्थान-उपचय का विरोधाभास: षष्ठ भाव की छुपी शक्ति
षष्ठ भाव का मूल स्वभाव एक उपयोगी विरोधाभास है। अष्टम और द्वादश के साथ यह दुःस्थान (दुःस्थान) है, अर्थात् कष्ट, हानि, रोग और बाधा से जुड़ा क्षेत्र। इसलिए यहाँ जीवन अक्सर पहले दबाव के रूप में बोलता है।
पर यही भाव उपचय (उपचय) भी है। उपचय भाव वे माने जाते हैं जहाँ परिणाम दोहराए हुए प्रयास, अभ्यास और समय के साथ बढ़ता है। इसीलिए षष्ठ को अष्टम या द्वादश जैसी केवल भय-दृष्टि से नहीं पढ़ना चाहिए। यह चोट देता है, पर प्रशिक्षित भी करता है। ऋण का लेखा वित्तीय अनुशासन बन सकता है, रोग शरीर-बुद्धि सिखा सकता है, शत्रु रणनीति को धार दे सकते हैं, और दैनिक सेवा तप बन सकती है। जो व्यक्ति षष्ठ भाव से सीधे जुड़ता है, वह अक्सर उसी क्षेत्र में बल पाता है जहाँ जीवन ने पहले दबाव डाला था।
इसे क्रम से देखें तो बात अधिक स्पष्ट होती है। ऋण पहले बोझ लगता है, पर वही व्यक्ति को हिसाब रखने और संसाधन सँभालने की शिक्षा देता है। रोग पहले कमजोरी की तरह आता है, पर वही आहार, दिनचर्या, व्यायाम और विश्राम का पाठ पढ़ाता है। शत्रु पहले भय या क्रोध जगाते हैं, पर वही योजना, संयम और सही समय पर उत्तर देने की बुद्धि जगाते हैं। इसी तरह सेवा पहले अधीनता लग सकती है, पर समय के साथ वही कौशल, विश्वसनीयता और विनम्रता का आधार बनती है।
इसीलिए पाप ग्रह षष्ठ भाव में अक्सर उपयोगी सिद्ध होते हैं। मंगल रोग, ऋण और विरोध को काटने का साहस देते हैं। शनि शीघ्र न सुलझने वाली लड़ाई को झेलने की दीर्घशक्ति देते हैं। राहु साधारण मार्ग बंद होने पर असामान्य रणनीति देता है। ये ग्रह कोमलता से अधिक सामना करने की क्षमता लाते हैं, और षष्ठ भाव को कई बार वही चाहिए।
यहाँ “पाप ग्रह” शब्द को नैतिक बुराई की तरह नहीं लेना चाहिए। ज्योतिषीय भाषा में यह उन ग्रहों की ओर संकेत करता है जिनकी ऊर्जा कठोर, तीखी, विलंबकारी या अस्थिर करने वाली हो सकती है। सामान्य परिस्थितियों में यह ऊर्जा कठिन लगती है, पर षष्ठ भाव में वही कठोरता विरोध का सामना करने, रोग से जूझने और ऋण को काटने में सहायक हो सकती है।
गुरु और शुक्र रक्षा, नीति और सौम्यता दे सकते हैं, पर यदि वे भाव की धार बहुत मुलायम कर दें तो व्यक्ति उस स्थान पर भी संकोच कर सकता है जहाँ दृढ़ता चाहिए। महाभारत का कुरुक्षेत्र यहाँ अच्छा पौराणिक दर्पण है: धर्म केवल भावना से नहीं बचता, उस कर्म से बचता है जिसे टालना ही अधर्म बन जाए।
मंगल और शनि: षष्ठ भाव के प्राकृतिक कारक
कारक ग्रह किसी भाव के स्वभाव को समझने की कुंजी देते हैं। षष्ठ भाव में मंगल (मंगल, मंगल) तीक्ष्ण कारक हैं: युद्ध, रक्त, शल्यक्रिया, चोट, सूजन और लड़ने की इच्छा। मंगल दिखाते हैं कि व्यक्ति शत्रु, संक्रमण, ऋण या मुकदमे का सामना कर सकता है या नहीं।
शनि (शनि, शनि) इसी भाव के धीमे कारक हैं: सेवा, श्रम, अधीनस्थ, दिनचर्या, दीर्घ रोग और वह धैर्य जिससे जीत अचानक नहीं, टिके रहने से आती है। शनि बताते हैं कि पहली ऊर्जा समाप्त होने के बाद व्यक्ति टिकेगा या नहीं। बुध फिर निदान, हिसाब और तर्क से इस क्षेत्र को परिष्कृत करता है। इसलिए परिपक्व षष्ठ भाव को साहस, सहनशक्ति और विवेक, तीनों चाहिए।
यदि केवल मंगल हो और शनि का धैर्य न हो, तो संघर्ष जल्द शुरू होता है पर टिकता नहीं। यदि केवल शनि हो और मंगल की निर्णायकता न हो, तो व्यक्ति सहता बहुत है पर उत्तर देने में देर कर सकता है। बुध की भूमिका इसी संतुलन को व्यावहारिक बनाती है: कौन सा रोग है, किस ऋण का कितना हिसाब है, किस विवाद में कौन सा तर्क काम करेगा। यही कारण है कि षष्ठ भाव में केवल वीरता नहीं, सही प्रबंधन भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
षष्ठ भाव में प्रत्येक ग्रह
षष्ठ भाव में ग्रहों को पढ़ते समय केवल यह नहीं देखा जाता कि ग्रह शुभ है या पाप। यह भी देखना पड़ता है कि वह ग्रह संघर्ष, रोग, ऋण और सेवा जैसे षष्ठ-भाव विषयों से किस प्रकार काम लेना चाहता है। कोई ग्रह सीधे लड़ता है, कोई सेवा के माध्यम से परिपक्व होता है, और कोई भीतर की कमजोरी को पहचान कर उसे साधना बनाता है।
हर ग्रह का फल उसकी शक्ति, पीड़ा, लग्न से संबंध और षष्ठेश से जुड़ाव के अनुसार बदलता है। इसलिए नीचे दिए गए फल मूल दिशा बताते हैं, अंतिम निर्णय नहीं। समर्थ ग्रह षष्ठ भाव की चुनौती को उपयोगी बना सकता है, जबकि अत्यधिक पीड़ित ग्रह वही विषय तनाव, रोग या विवाद के रूप में अधिक तीखा कर सकता है।
सूर्य (सूर्य) षष्ठ भाव में
षष्ठ भाव में सूर्य उस क्षेत्र में आता है जहाँ अधिकार को दबाव में सिद्ध होना पड़ता है। ऐसे लोग प्रायः चुनौती मिलने पर अपना आत्मविश्वास खोजते हैं। विरोध उनके अहं को केवल चोट नहीं पहुँचाता। सही समर्थन हो तो वही विरोध उद्देश्य और नेतृत्व में बदल सकता है।
काम में जिम्मेदारी, नेतृत्व या स्पष्ट सेवा-भूमिका चाहिए, क्योंकि लंबी अधीनता सूर्य-बल को सुखा देती है। स्वास्थ्य संकेत हृदय, रीढ़, नेत्र या जीवन-ऊर्जा से जुड़ सकते हैं, यद्यपि समर्थ सूर्य रोग से लड़ने की शक्ति भी देता है। पिता या पितृतुल्य व्यक्ति स्वास्थ्य अथवा पेशागत विरोध से गुज़रे हो सकते हैं। सिंह लग्न के लिए सूर्य लग्नेश है, इसलिए षष्ठ में उसकी स्थिति पहचान को कर्तव्य और जीते हुए संघर्ष से गढ़ती है।
चन्द्र (चन्द्र) षष्ठ भाव में
षष्ठ भाव में चन्द्र मन और शरीर के द्वार से संघर्ष को भीतर लाता है। इस स्थिति में व्यक्ति सहकर्मियों, रोगियों, सेवकों, पशुओं या पीड़ित लोगों का दुख जल्दी महसूस कर सकता है। इसलिए चिकित्सा, नर्सिंग, परामर्श, भोजन-सेवा या सामाजिक कार्य की ओर स्वाभाविक खिंचाव बनता है।
यही संवेदनशीलता कमजोरी भी बन सकती है। क्षीण, कृष्ण पक्ष या पीड़ित चन्द्र हो तो स्वास्थ्य-चिंता, पाचन विकार, हार्मोनल उतार-चढ़ाव और भावनात्मक तनाव का शरीर में उतरना दिख सकता है। माता ने भी स्वास्थ्य अथवा विरोध की परिस्थितियाँ झेली हों। चन्द्र उज्ज्वल, समर्थ और शुभ हो तो यही स्थिति करुणामय उपचारक बनाती है।
मंगल (मंगल) षष्ठ भाव में
षष्ठ भाव में मंगल साफ रणभूमि पाता है। शस्त्र, रक्त, शल्य और निर्णायक कर्म का ग्रह उस भाव में आता है जिसे सचमुच इन गुणों की आवश्यकता होती है। ऐसे लोग मुकदमेबाजी, सेना, शल्य-चिकित्सा, खेल, सुरक्षा, वकालत या किसी भी दबावपूर्ण क्षेत्र में प्रभावी हो सकते हैं।
वे ऋण को लटकाना, रोग को निष्क्रिय ढंग से झेलना या शत्रु को अनुत्तरित छोड़ना पसंद नहीं करते। मंगल शुभ और समर्थ हो तो शरीर-बल और पुनर्लाभ अच्छा रहता है। सावधानी भी उतनी ही आवश्यक है, क्योंकि मंगल यहाँ कभी-कभी युद्ध इसलिए बना देता है कि योद्धा बेचैन है। मेष और वृश्चिक लग्न के लिए, जहाँ मंगल लग्नेश हैं, यह स्थिति अत्यंत शक्तिशाली हो सकती है, पर हर असुविधा को शत्रु समझने से बचना होगा।
बुध (बुध) षष्ठ भाव में
षष्ठ भाव में बुध स्वास्थ्य, सेवा और संघर्ष के प्रति बुद्धिमान, विश्लेषणात्मक और संचार-आधारित दृष्टिकोण देता है। यहाँ समस्या को केवल बल से नहीं, समझ से खोला जाता है। चिकित्सा निदान, कानूनी तर्क, ऋण-प्रबंधन और कार्यस्थल की उलझनों में बुध की तीक्ष्ण विवेकशीलता सहायक होती है।
इस स्थिति में शत्रुओं को बौद्धिक रणनीति, श्रेष्ठ सूचना और कानूनी सटीकता से पराजित किया जाता है। विश्लेषणात्मक स्वास्थ्य-सेवाएँ, लेखाकर्म, कानूनी मसौदा तैयार करना, चिकित्सा-शोध और प्रशासनिक सेवा-भूमिकाएँ स्वाभाविक रूप से फलती हैं। मिथुन और कन्या लग्न वाले लोगों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से उपयोगी है।
गुरु (गुरु) षष्ठ भाव में
षष्ठ भाव में गुरु सरल शुभफल नहीं देते। गुरु जिस क्षेत्र को छूते हैं उसे फैलाते हैं, और दुःस्थान में यह विस्तार ऋण, दायित्व, विवाद या स्वास्थ्य-चिंता को भी बढ़ा सकता है यदि कुंडली में अनुशासन न हो। पर यही गुरु संघर्ष में विवेक भी देते हैं।
इस स्थिति वाला व्यक्ति शिक्षण, विधि, नीति, चिकित्सा, परामर्श, धार्मिक संस्थानों या ज्ञान-आधारित सेवा से जुड़ सकता है। शत्रु अक्सर ज्ञान, प्रतिष्ठा या नैतिक अधिकार से ईर्ष्या के कारण उठते हैं। व्यापक ज्योतिष परम्परा में गुरु का कार्य अर्थ को पुनः स्थापित करना है। इसलिए षष्ठ भाव का संघर्ष दंड मात्र नहीं रहता, बल्कि विनम्रता, बुद्धि और पुण्य अर्जित करने का क्षेत्र बन सकता है।
शुक्र (शुक्र) षष्ठ भाव में
षष्ठ भाव में शुक्र सेवा-क्षमता को रचनात्मक, सौन्दर्यात्मक या संबंध-आधारित माध्यमों से व्यक्त करता है। शत्रु प्रेम-प्रतिद्वंद्विता, सामाजिक ईर्ष्या या सौन्दर्य-प्रतिस्पर्धा से उठ सकते हैं। पारम्परिक ज्योतिषीय संबन्ध शुक्र को वृक्क, प्रजनन-तंत्र, कण्ठ और मिठास के नियमन से जोड़ते हैं, पर ये चिकित्सकीय निदान नहीं हैं। ऋण विलासिता-व्यय या संबंध-दायित्वों से उत्पन्न हो सकता है।
सौहार्द का ग्रह होने के कारण शुक्र संघर्ष-परिभाषित षष्ठ भाव में असहज हो सकता है। फिर भी वृष और तुला लग्न के लिए, जहाँ शुक्र लग्नेश हैं, यह स्थिति विशेष महत्त्व रखती है। यहाँ संबंध और सौन्दर्य भी सेवा, अनुशासन और सीमा-बोध से परिपक्व होते हैं।
शनि (शनि) षष्ठ भाव में
षष्ठ भाव में शनि वह काम करते हैं जिसे वे भली-भाँति जानते हैं। श्रम, धैर्य, अभाव और समय के ग्रह के लिए यह श्रेष्ठ स्थानों में है, क्योंकि षष्ठ भाव की समस्याएँ एक वीर क्षण में प्रायः नहीं सुलझतीं। दीर्घ रोग दिनचर्या माँगता है, ऋण पुनर्भुगतान माँगता है, सेवा भरोसा माँगती है, और शत्रु को कभी-कभी केवल समय से थकाना पड़ता है।
ऐसे लोग संस्था में सबसे टिकाऊ व्यक्ति बन सकते हैं। मकर और कुम्भ लग्न में शनि लग्नेश भी हैं, इसलिए स्वयं का निर्माण कर्तव्य और सहनशक्ति से होता है। खतरा यह है कि सेवा बोझ बन जाए। यहाँ विश्राम आलस्य नहीं, उपाय का भाग है।
राहु (राहु) षष्ठ भाव में
षष्ठ भाव में राहु की सीमा-तोड़ने वाली, अपरम्परागत ऊर्जा तब कारगर हो सकती है जब उसे काल्पनिक शत्रुओं के बजाय वास्तविक बाधाओं पर लगाया जाए। ऐसे लोग प्रतिद्वंद्वियों को अपरंपरागत तरीकों, विदेशी संपर्कों या तकनीकी श्रेष्ठता से पराजित कर सकते हैं।
ऋण जटिल हो सकता है, किन्तु अप्रत्याशित तरीकों से समाप्त भी हो सकता है। रोग असामान्य या प्रारंभ में गलत निदानित हो सकता है, फिर भी राहु की दृढ़ जिज्ञासा व्यक्ति को उन स्थितियों को शोधने और अंततः समाधान खोजने की प्रेरणा देती है। प्रतिस्पर्धी व्यापार, जासूसी कार्य, न्यायालयिक चिकित्सा और क्रॉस-कल्चरल सेवा में यह स्थिति विशेष रूप से लाभदायक है।
केतु (केतु) षष्ठ भाव में
कुछ ज्योतिषीय व्याख्याएँ षष्ठ भाव के केतु को शत्रु, रोग और षड्रिपु से अनासक्ति के साथ जोड़ती हैं। इस स्थिति में संघर्ष कम तात्कालिक लग सकते हैं, या व्यक्ति सीधे टकराव के बजाय आन्तरिक समता से काम लेना चाह सकता है। फिर भी अनासक्ति किसी व्यावहारिक समस्या के स्वतः समाप्त होने की गारंटी नहीं है।
विरोध कभी-कभी बिना सीधे टकराव के ढीला पड़ सकता है, पर स्वास्थ्य सम्बन्धी चिन्ता को रहस्यमय या कार्मिक मानकर चिकित्सकीय जाँच नहीं टालनी चाहिए। केतु सूक्ष्म या आध्यात्मिक सेवा की प्रवृत्ति दे सकता है, लेकिन विरक्तता को लापरवाही नहीं बनने देना चाहिए।
षष्ठेश का प्रत्येक भाव में फल
षष्ठ भाव का स्वामी, अर्थात् षष्ठेश, जहाँ भी जाता है वहाँ शत्रु, रोग, ऋण और सेवा के कारकत्व साथ ले जाता है। इसलिए इसे केवल “कठिन ग्रह” की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। यह बताता है कि जीवन के किस क्षेत्र में सुधार, परिश्रम, संघर्ष-प्रबंधन और सेवा की माँग सबसे अधिक होगी। उसकी भाव स्थिति, राशि, दृष्टि और युति से यह जाना जाता है कि षष्ठ भाव के विषय किस रूप में प्रकट होंगे।
सरल पद्धति यह है: पहले देखें षष्ठेश किस भाव में गया है, क्योंकि वही जीवन-क्षेत्र बताएगा। फिर देखें वह किस राशि में है और किस ग्रह से जुड़ा है, क्योंकि इससे संघर्ष की शैली समझ आती है। अंत में दशा और गोचर देखें, क्योंकि वही बताते हैं कि यह विषय कब सक्रिय होकर अनुभव में आता है।
षष्ठेश प्रथम भाव में
षष्ठेश प्रथम भाव में हो तो पहचान और शरीर सीधे षष्ठ भाव के विषयों से जुड़ जाते हैं। व्यक्ति प्रतिकूलता पर विजय के माध्यम से स्वयं को परिभाषित कर सकता है, शरीर रोग-प्रवण हो सकता है, या जीवन सेवा-उन्मुख क्षेत्रों में लग सकता है। प्रथम भाव षष्ठेश की प्रतिकूल ऊर्जा को सबसे व्यक्तिगत और तात्कालिक अभिव्यक्ति देता है।
षष्ठेश द्वितीय भाव में
षष्ठेश द्वितीय भाव में आए तो पारिवारिक व्यय, वाणी-विवाद या उत्तराधिकार की जटिलताओं से ऋण संचित हो सकता है। आय षष्ठ-भाव के व्यवसायों से भी आ सकती है, विशेषकर सेवा, उपचार, विधि, लेखा या प्रतिस्पर्धी कामों से। षष्ठेश का सक्रिय काल ऋण-संचय, ऋण-निपटान या कार्यस्थल-विवाद का समय बना सकता है।
षष्ठेश तृतीय भाव में
तृतीय भाव में षष्ठेश अनुज भाई-बहनों या निकट मित्रों के साथ संघर्ष दिखा सकता है। यहाँ शत्रुओं का सामना साहसी संचार, पहल और हाथ के काम से होता है। चूँकि तृतीय और षष्ठ दोनों उपचय भाव हैं, इसलिए प्रयास का बल द्विगुणित हो जाता है। निरंतर साहसिक पहल से शत्रुओं पर विजय संभव होती है।
षष्ठेश चतुर्थ भाव में
षष्ठेश चतुर्थ भाव में हो तो षष्ठ-भाव के विषय घरेलू शांति को छूते हैं। घर में विवाद, माता को स्वास्थ्य कठिनाइयाँ, या सम्पत्ति से जुड़े ऋण सामने आ सकते हैं। भावनात्मक नींव में अनसुलझे संघर्षों के अवशेष भी हो सकते हैं, जिन्हें दबाने के बजाय क्रमशः समझना पड़ता है।
षष्ठेश पंचम भाव में
षष्ठेश पंचम भाव में हो तो संतान, सृजनात्मक कार्य या सट्टे के निवेश के इर्द-गिर्द संघर्ष उठ सकते हैं। कानूनी विवाद मनोरंजन या शिक्षा से जुड़े हो सकते हैं। यह स्थिति शत्रु-भाव को पुण्य भाव (पंचम) से जोड़ती है, इसलिए विरोधी संघर्ष में संलग्नता अंततः महत्त्वपूर्ण कार्मिक फल उत्पन्न करती है।
षष्ठेश षष्ठ भाव में
षष्ठेश अपने ही भाव में हो तो स्थिति बलशाली और स्वयं को मजबूत करने वाली बन सकती है। विरोध का सामना करने, स्वास्थ्य-अनुशासन बनाए रखने और सेवा में टिके रहने की क्षमता बढ़ सकती है। यह स्थिति चिकित्सा, विधि, सैन्य सेवा या प्रतिस्पर्धी खेल जैसे षष्ठ-भाव विषयों वाले काम को सहारा दे सकती है, पर अकेले इससे पेशा तय नहीं होता। दशम भाव, संबंधित भावेश और पूरी कुंडली का समर्थन भी देखना चाहिए।
षष्ठेश सप्तम भाव में
षष्ठेश सप्तम भाव में हो तो साझेदारियाँ षष्ठ-भाव ऊर्जाओं से प्रभावित होती हैं। जीवनसाथी स्वास्थ्य चुनौतियाँ रख सकता है, सेवा या स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्यरत हो सकता है, या प्रतिकूल परिस्थितियों के माध्यम से जीवन में आ सकता है। व्यावसायिक साझेदारी में छुपे शत्रुतापूर्ण आयाम हो सकते हैं। सप्तम भाव का साझेदारी-विरोध अक्ष षष्ठेश की स्थिति से मौलिक रूप से आकारित होता है।
षष्ठेश अष्टम भाव में
षष्ठेश अष्टम भाव में एक जटिल युग्म बनाता है। शत्रु और रोग के स्वामी का रूपांतरण के भाव में प्रवेश जटिल स्वास्थ्य प्रतिरूपों, गुप्त शत्रुओं और छुपे स्रोतों से उत्पन्न ऋण का संकेत देता है। उत्तराधिकार विवाद संभव हो सकते हैं। दुःस्थान भाव मार्गदर्शिका में षष्ठ-अष्टम युग्म का विस्तृत विश्लेषण उपलब्ध है।
षष्ठेश नवम भाव में
षष्ठेश नवम भाव में हो तो शत्रु वैचारिक विरोधी हो सकते हैं। दीर्घ यात्राएँ स्वास्थ्य या सेवा-उद्देश्य से हो सकती हैं, और पिता को षष्ठ-भाव चुनौतियाँ मिल सकती हैं। नवम भाव त्रिकोण होने से एक सुरक्षात्मक कवच बनता है, जहाँ धर्म और उच्च ज्ञान शत्रुओं के विरुद्ध साधन बनते हैं। बारह भाव मार्गदर्शिका में दुःस्थानेश-त्रिकोण गतिशीलता का पूर्ण विश्लेषण है।
षष्ठेश दशम भाव में
षष्ठेश दशम भाव में हो तो करियर षष्ठ-भाव क्षेत्रों के माध्यम से बन सकता है: चिकित्सा, विधि, सेना, सामाजिक सेवा या प्रतिस्पर्धी व्यापार। जन-प्रतिष्ठा शत्रुओं और विपरीत परिस्थितियों पर विजय से परिभाषित होती है। दशम भाव षष्ठेश की प्रतिकूल ऊर्जा को सर्वाधिक सार्वजनिक और सामाजिक रूप से मान्यता प्राप्त अभिव्यक्ति देता है।
षष्ठेश एकादश भाव में
षष्ठेश एकादश भाव में हो तो षष्ठ-भाव की गतिविधियों के माध्यम से लाभ मिल सकता है। नेटवर्क में प्रतिद्वंद्वी, सेवा-सहयोगी और स्वास्थ्य पेशेवर शामिल हो सकते हैं। स्वास्थ्य-सेवा, विधि, सैन्य या सेवा-करियर से आय सुसंगत और विकासशील हो सकती है। यहाँ संघर्ष केवल खर्च नहीं करता। सही दिशा में लगाया जाए तो वह लाभ-स्रोत भी बनता है।
षष्ठेश द्वादश भाव में (हर्ष योग)
षष्ठेश का द्वादश भाव में होना विपरीत राज योग की षष्ठेश शाखा है, जिसे सामान्यतः हर्ष योग (हर्ष योग) से जोड़ा जाता है। यहाँ तर्क उलटाव का है: शत्रु, ऋण और रोग का स्वामी दूसरे दुःस्थान में चला गया, इसलिए षष्ठ भाव की कठोरता हानि, निवृत्ति और विलय के भाव में आंशिक रूप से खर्च होती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि कठिनाई अपने-आप शुभफल बन जाएगी। विपरीत राज योग में भी लग्न, षष्ठेश की शक्ति, दृष्टियाँ और दशा-काल देखे जाते हैं। यदि आधार ठीक हो तो कठिन भाव का स्वामी दूसरे कठिन भाव में जाकर समस्या की दिशा बदल सकता है। यदि आधार कमजोर हो तो वही उलटाव खर्च, थकान या अलगाव के रूप में भी अनुभव हो सकता है। यही सावधानी हर्ष योग को अतिशयोक्ति से बचाती है और पठन को संतुलित रखती है।
कुंडली का समर्थन हो तो शत्रु स्वयं थक सकते हैं, ऋण अप्रत्याशित मार्ग से उतर सकता है, और रोग विश्राम, अस्पताल, आध्यात्मिक अनुशासन या विदेश-संबंध से सुधर सकता है। समर्थन न हो तो यही स्थिति स्वास्थ्य, मुकदमे या सेवकों पर खर्च भी दिखा सकती है। भावेश स्थिति मार्गदर्शिका में षष्ठ, अष्टम और द्वादशेश के विपरीत राज योग प्रतिरूपों का विस्तृत विश्लेषण है।
व्यावहारिक भविष्यकथन के उपयोग
भविष्यकथन में षष्ठ भाव को अलग से नहीं पढ़ा जाता। इसे लग्न, षष्ठेश, स्थित ग्रहों, दशा और गोचर के साथ मिलाकर देखा जाता है। तभी पता चलता है कि ऋण, रोग, शत्रु या सेवा का विषय केवल संभावना है, सक्रिय समय है, या जीवन की प्रमुख साधना बन चुका है।
व्यावहारिक पठन में तीन प्रश्न सहायक होते हैं। पहला, समस्या किस प्रकृति की है: वित्तीय, शारीरिक, कानूनी, कार्यस्थलीय या मनोवैज्ञानिक? दूसरा, उसकी तीव्रता कितनी है: हल्की असुविधा, आवर्ती पैटर्न या दीर्घ संघर्ष? तीसरा, प्रतिक्रिया का मार्ग क्या है: उपचार, भुगतान, रणनीति, सेवा, या अनुशासन? षष्ठ भाव इन तीनों प्रश्नों को एक साथ रखता है।
दशा और गोचर इस पठन को समय देते हैं। दशा बताती है कि जन्मकुंडली का कौन सा ग्रह अपनी अवधि में प्रमुख अनुभव दे रहा है, जबकि गोचर वर्तमान आकाश की चाल से दबाव या अवसर को सक्रिय करता है। इसलिए षष्ठ भाव में कोई योग दिखे तो भी उसके फल को समय के संदर्भ में ही समझना चाहिए।
कुंडली में ऋण (ऋण) का विश्लेषण
ज्योतिष में षष्ठ भाव वित्तीय ऋण के साथ व्यक्ति के संबंध का प्रमुख संकेतक है। बलशाली और सुयोजित षष्ठ भाव, जहाँ षष्ठेश सुस्थित हो और ग्रह रचनात्मक रूप से काम कर रहे हों, ऋण के प्रभावी प्रबंधन की क्षमता दिखा सकता है। शुभ ग्रह केवल उपस्थित होने से भाव को कमज़ोर नहीं करते। उनकी राशि-स्थिति, भावेशत्व और दृष्टियाँ तय करती हैं कि वे विवेक की रक्षा करेंगे या टालने की प्रवृत्ति बढ़ाएँगे। समर्थ स्थिति में हिसाब, अनुशासन और क्रमशः भुगतान ऋण को बन्धन बनने से रोक सकते हैं।
इसके विपरीत, कमज़ोर या अत्यधिक पीड़ित षष्ठ भाव आवर्ती ऋण-चक्र का संकेत दे सकता है, विशेषकर जब षष्ठेश नीच, अस्त या अष्टम-द्वादश में हो। षष्ठेश की दशा प्रायः ऋण-काल से मेल खाती है। उसी समय ऋण लिया जा सकता है, विवादित हो सकता है, या अंततः समाप्त भी हो सकता है।
रोग-काल और षष्ठ भाव
ज्योतिषीय परम्परा षष्ठ भाव को सम्भावित स्वास्थ्य-संवेदनशीलताओं से जोड़ती है। पारम्परिक ग्रह-संबंधों में शनि दीर्घकालिक या अस्थि-स्नायु विषयों, मंगल चोट, शल्यक्रिया या सूजन, और चन्द्र पाचन, द्रव तथा भावनात्मक लय से जुड़ता है। ये प्रतीकात्मक संबंध हैं, रोग का प्रमाण या चिकित्सकीय निदान नहीं।
ज्योतिषी रोग-काल के प्रतीकात्मक संकेतों में शनि या राहु का षष्ठ भाव से गोचर, या षष्ठेश पर उनका गोचर, देख सकते हैं। पर ये योग न तो रोग सिद्ध करते हैं, न चिकित्सा की आवश्यकता तय करते हैं। स्वास्थ्य-लक्षण और जोखिम का मूल्यांकन योग्य चिकित्सक से कराना चाहिए। ज्योतिषीय पठन में भी षष्ठ को अकेला नहीं, प्रथम और अष्टम भाव के साथ पढ़ा जाता है।
शत्रु, प्रतिद्वंद्वी और विरोध की प्रकृति
षष्ठ भाव सभी प्रतिकूल संबंधों का वर्णन नहीं करता। सप्तम भाव खुले शत्रुओं को दिखाता है, जो व्यक्ति का सीधे और समान स्तर पर सामना करते हैं। षष्ठ भाव उन लोगों को दर्शाता है जो प्रतिद्वंद्विता, संस्थागत प्रतिस्पर्धा या छुपी ईर्ष्या के माध्यम से विरोध करते हैं।
इसलिए षष्ठ भाव का शत्रु हमेशा युद्धभूमि में सामने खड़ा नहीं होता। वह सहकर्मी, वादी, प्रतियोगी, अधीनस्थ, रोगकारक आदत या भीतर की कोई ऐसी वृत्ति भी हो सकती है जिसे नियमित अभ्यास से साधना पड़ता है। दुःस्थान भाव मार्गदर्शिका में विरोधी ऊर्जा के रूपांतरण की पूर्ण प्रक्रिया विस्तार से समझाई गई है।
सेवा, दैनिक कार्य और षष्ठ भाव का छुपा वरदान
षष्ठ भाव केवल संघर्ष का नहीं, सेवा का भी भाव है। यह वह अनुशासित दैनिक कार्य है जिसे अधिकांश लोग अपने जीवन का बड़ा भाग समर्पित करते हैं। बलशाली षष्ठ भाव सेवा-उन्मुख व्यवसायों, जैसे चिकित्सा, विधिक सहायता, लोक-प्रशासन, आतिथ्य और सामाजिक कार्य, में उत्कृष्टता उत्पन्न करता है।
उपचय-भाव की प्रकृति का अर्थ है कि यहाँ की गई सेवा समय के साथ चक्रवृद्धि लाभ देती है। छोटे-छोटे दैनिक कर्म धीरे-धीरे कौशल, भरोसा और आंतरिक बल बनाते हैं। षष्ठ भाव का छुपा वरदान यही है: अनुशासित सेवा वास्तविक स्वतंत्रता का सर्वाधिक विश्वसनीय पथ बन सकती है।
पीड़ा और उपाय
षष्ठ भाव के उपायों में भक्ति, दान और जीवनशैली तीनों को साथ देखना चाहिए। केवल मंत्र जपकर ऋण की अनदेखी करना, या केवल व्यायाम करके भीतर के क्रोध को न देखना, षष्ठ भाव की पूरी शिक्षा को अधूरा छोड़ देता है।
इस भाव का उपाय हमेशा किसी न किसी प्रकार के उत्तरदायित्व से जुड़ता है। मंत्र मन को स्थिर करता है, दान प्रतिस्पर्धी अहंकार को सेवा में बदलता है, और अनुशासन शरीर तथा व्यवहार को नया क्रम देता है। जब ये तीनों साथ आते हैं, तब षष्ठ भाव का दबाव धीरे-धीरे साधना में बदलने लगता है।
पीड़ित षष्ठ भाव के संकेत
षष्ठ भाव तब पीड़ित माना जा सकता है जब षष्ठेश नीच, अस्त या अष्टम-द्वादश में बिना प्रतिपूरक बल के हो, लग्नेश और षष्ठेश बिना शुभ रक्षा के युत हों, या मंगल-शनि दोनों एक साथ भारी पीड़ित हों। गुरु या शुक्र का षष्ठ भाव में होना अपने-आप में पीड़ा नहीं है। उनकी राशिगत शक्ति, भावेशत्व, दृष्टि और पूरी कुंडली बताती है कि वे रक्षा देंगे, संघर्ष को संयमित करेंगे या जहाँ दृढ़ता चाहिए वहाँ टालने की प्रवृत्ति बढ़ाएँगे। इसी तरह षष्ठेश का अष्टमेश या द्वादशेश से राशि-परिवर्तन मिश्रित दुःस्थान संबंध है, स्वतः पीड़ा नहीं। अन्य संबंध और विपरीत-योग की सम्भावना उसका फल तय करते हैं।
व्यावहारिक परिणामों में अनसुलझा रोग, निरंतर ऋण-चक्र, मुकदमेबाजी में आवर्ती हार, और ऐसे कार्यस्थल-विवाद दिख सकते हैं जो आसानी से समाप्त नहीं होते। यही कारण है कि षष्ठ भाव में उपाय का अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि व्यवहार में सुधार भी है।
मंत्र उपाय
षष्ठ-भाव पीड़ा के लिए दुर्गा सप्तशती स्वाभाविक भक्ति-आधार है, विशेषकर कवच श्लोक और मध्य चरित्र, जहाँ देवी महिषासुर-मर्दिनी रूप में प्रकट होती हैं। शास्त्रीय क्रम में पहला प्रसंग मधु-कैटभ का है, जबकि महिषासुर-वध देवी माहात्म्य के मध्य प्रसंग में आता है। यह भेद इसलिए आवश्यक है कि उपाय पाठ-आधारित रहे, केवल अस्पष्ट स्मृति पर नहीं।
मंगल-पीड़ा में मंगल बीज मंत्र (ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः) मंगलवार को साहस से जुड़ी भक्ति-साधना के रूप में जपने की परम्परा है। महामृत्युञ्जय मंत्र (ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्) ऋग्वेद 7.59.12 में त्र्यम्बक-रुद्र को समर्पित मंत्र है। यह भय, रोग और मृत्यु पर भक्तिमय मनन का आधार देता है। मंत्र-साधना आध्यात्मिक स्थिरता दे सकती है, पर वह चिकित्सा का विकल्प नहीं है।
दान
दान में ग्रह की पीड़ा के अनुसार वस्तु और प्राप्तकर्ता चुने जाते हैं। मंगल-पीड़ा में मंगलवार को मसूर की दाल, तांबे के बर्तन, या सैनिकों और शल्य-चिकित्सकों को संसाधन दान करें। शनि-पीड़ा में शनिवार को काले तिल, लोहे की वस्तुएँ, या मजदूरों और वृद्धों को कंबल दान करें। राहु-पीड़ा में शनिवार को दुर्गा मंदिर में दान दें या विदेशियों की सहायता करें।
षष्ठ-भाव के दान का मूल सिद्धांत है कि प्रतिस्पर्धी अहंकार को सचेत रूप से शांत किया जाए। शत्रु के बजाय वंचितों को देना इस भाव के सबसे शक्तिशाली उपायों में से एक है, क्योंकि इससे लड़ाई की ऊर्जा सेवा की दिशा में मुड़ती है।
व्यावहारिक उपाय
षष्ठ भाव के सबसे व्यावहारिक और अक्सर उपेक्षित उपाय जीवनशैली का अनुशासन हैं। नियमित दिनचर्या ढाँचा देती है, और चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त व्यायाम स्वास्थ्य को सहारा देता है और मंगल के प्रतीक को व्यावहारिक रूप देता है। व्यायाम को व्यक्ति की स्थिति और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ढालना चाहिए। साथ ही समस्त वित्तीय ऋणों का सावधान हिसाब रखकर उन्हें व्यवस्थित रूप से चुकाना चाहिए।
कार्यस्थल-विवादों में समभाव बनाए रखें, और जब भी संभव हो मुकदमेबाजी से बचकर समझौते के माध्यम से समाधान खोजें। उपचय-भाव के रूप में षष्ठ भाव निरन्तर प्रयास के महत्त्व को रेखांकित करता है। भक्ति और अनुशासन सहारा दे सकते हैं, पर वे चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह के विकल्प नहीं हैं। त्रिकोण-केंद्र भाव विश्लेषण भी देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नीचे के उत्तर षष्ठ भाव की मुख्य बातों को संक्षेप में जोड़ते हैं। विस्तृत निर्णय के लिए हमेशा लग्न, षष्ठेश, स्थित ग्रह, दशा और गोचर को साथ पढ़ें।
- वैदिक ज्योतिष में षष्ठ भाव क्या दर्शाता है?
- षष्ठ भाव (रिपु भाव / शत्रु भाव) शत्रु, रोग, ऋण, सेवा, दैनिक कार्य, मुकदमेबाजी, सेवक और छह आंतरिक शत्रुओं, अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर्य को दर्शाता है। यह तीन दुःस्थान भावों में से एक और उपचय भाव भी है, इसलिए यहाँ निरंतर प्रयास का विशेष महत्त्व है। पाप ग्रह साहस या सहनशक्ति दे सकते हैं और शुभ ग्रह रक्षा या संयम; अंतिम फल पूरी कुंडली से तय होता है।
- षष्ठ भाव में पाप ग्रह क्यों अच्छे माने जाते हैं?
- पाप ग्रह (मंगल, शनि, राहु, केतु) षष्ठ भाव में उत्पादक रूप से काम कर सकते हैं, क्योंकि यह भाव प्रतिस्पर्धा और दबाव से जुड़ा है। मंगल सामना करता है, शनि टिकाऊपन देता है और राहु अपरम्परागत रणनीति देता है। गुरु और शुक्र रक्षा और संयम दे सकते हैं; उनकी उपस्थिति अपने-आप में पीड़ा नहीं है। फल ग्रह-बल, भावेशत्व, दृष्टि और पूरी कुंडली पर निर्भर करता है। दुःस्थान भाव मार्गदर्शिका में पूर्ण ढाँचा उपलब्ध है।
- षष्ठ भाव के शत्रु और सप्तम भाव के शत्रु में क्या अंतर है?
- षष्ठ भाव प्रतिद्वंद्वियों, छुपे शत्रुओं और अधीनता या छुपी ईर्ष्या की स्थिति से विरोध करने वालों को दर्शाता है, प्रायः संस्थागत, कार्यस्थल या कानूनी माध्यमों से। सप्तम भाव खुले शत्रुओं को दर्शाता है जो व्यक्ति का सीधे समान-स्तर की सार्वजनिक टकराहट में सामना करते हैं। सप्तम भाव मार्गदर्शिका देखें।
- षष्ठ भाव जन्मकुंडली में स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है?
- ज्योतिष में षष्ठ भाव को रोग और स्वास्थ्य-सम्बन्धी दबाव के प्रतिरूपों के लिए पढ़ा जाता है। पारम्परिक सम्बन्ध शनि को दीर्घकालिकता, मंगल को चोट या सूजन और चन्द्र को पाचन तथा भावनात्मक तनाव से जोड़ते हैं। गोचर प्रतीकात्मक समय-संकेत हो सकते हैं, पर कुंडली रोग का निदान नहीं करती। लक्षण और जोखिम का मूल्यांकन योग्य चिकित्सक से कराना चाहिए। कुंडली मार्गदर्शिका में प्रथम, षष्ठ और अष्टम भाव के संयुक्त पठन को समझें।
- हर्ष योग क्या है और इसे कैसे पढ़ना चाहिए?
- हर्ष योग (हर्ष योग) विपरीत राज योग की षष्ठेश शाखा है। कई परम्पराएँ इसे तब पढ़ती हैं जब षष्ठेश किसी दुःस्थान में हो, जिसमें यहाँ का द्वादश भाव भी आता है। सिद्धांत उलटाव का है: शत्रु, ऋण और रोग का स्वामी दूसरे कठिन भाव में जाकर अपनी कठोरता को कमजोर या पुनर्निर्देशित करता है। परिणाम शत्रु-विजय, ऋण-राहत या रोग-सुधार हो सकता है, पर यह तभी स्पष्ट होता है जब बाकी कुंडली समर्थन दे। सरल योग अष्टमेश शाखा है और विमल योग द्वादशेश शाखा। भावेश स्थिति मार्गदर्शिका देखें।
- षष्ठ भाव को स्वास्थ्य, ऋण-प्रबंधन और शत्रु-रक्षा के लिए कैसे बलशाली बनाएँ?
- पारम्परिक भक्ति-साधना में दुर्गा सप्तशती या कवच, मंगलवार को मंगल बीज मंत्र (ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः) और महामृत्युञ्जय मंत्र शामिल हैं। व्यावहारिक अनुशासन में नियमित दिनचर्या, चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त व्यायाम, ऋण का व्यवस्थित भुगतान, दान, कार्यस्थल-विवाद में समभाव और अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचाव आते हैं। भक्ति मन को स्थिर कर सकती है, पर वह चिकित्सकीय, कानूनी या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। उपाय खण्ड में पीड़ित ग्रह के अनुसार मार्गदर्शन उपलब्ध है।
परामर्श के साथ अन्वेषण करें
षष्ठ भाव वह स्थान है जहाँ जन्मकुंडली जीवन के सबसे अधिक घर्षण से मिलती है। वही घर्षण यदि सीधे, अनुशासित साहस से साधा जाए तो टिकाऊ शक्ति, सेवा और स्वतंत्रता दे सकता है। चाहे आप स्वास्थ्य-दुर्बलताओं, व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वियों, ऋण-दायित्व या षड्रिपु की प्रकृति को समझना चाहते हों, रिपु भाव में काम के संकेत मिलते हैं। परामर्श स्विस एफेमेरिस डेटा से आपकी सम्पूर्ण कुंडली की गणना करता है: आपके षष्ठ भाव में राशि और ग्रह, आपके षष्ठेश की बारह भावों में स्थिति, हर्ष-प्रकार विपरीत राज योग की सम्भावना, और मंगल-शनि द्वारा स्वास्थ्य-प्रतिरोध तथा शत्रु-निवारण क्षमता का सक्रियण।